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अनुसन्धान-७५(२)
ते बिण्हइ भांगा वखाणइ छइ -
कम्मिय चुल्लिय भायण डोवठिअं पूड़ कप्पई पुढो ।
तं, बीअं कम्मिअ वाघार हिंगु लोणाइ जत्थ छुहे२ ॥३४॥
[कम्मि० ॥] आधाकर्मी आहार जीणइ चूल्हइ अथवा भाजिन रांधिउ हुई, अथवा जीणइ डोईइ विहराविउ हुइ, तीणइ चूल्हइ भाजनि अथवा डोईइ जे अनेरु सूधउ आहार घालीइं ते उपकरण आश्री पूतिकर्म कहीइ । पुण ते आहार महात्मा प्रति कल्पतउ हुइ । पुण जउ ते गृहस्थ ते भाजन थिकउं ते वस्तु अलगी करइ, अनेरइ भाजनि आपहणी घालइ तउ सूझतइ । तथा बीजइ भांगइ आधाकर्मी वघार अथवा हींगु अथवा लूण प्रमुख वस्तु जे अनेरा आहारनइं संस्करवानइ काजिइ माहि घालीयइ ते भातपाणी आश्री बीजइ पूतिकर्म कहीइ । ते महात्माहुइं न कल्पइं ॥३४॥
हिव एह जि भातपाणीनउ बीजउ बादरपूतिकर्मनउ भांगउ वली वखाणइ छइ -
कम्मिय वेसण धूमिअ-महव कयंकम्मखरडिए भाणे ।
आहारपूइ तं कम्म-लित्तहत्थाइ छक्कं च ॥३५॥ [कम्मिय० ॥] अथवा आधाकर्मी वेसणइ-तप्तघृतादि प्रमुख वस्तुइ करी जे आहार धूपीइ वा संस्करीइ ते बादर पूतिकर्म कहीइ, ते वर्जिवउ । अथवा आधाकर्मी आहारइ जे भाजन खरडिउं हुइ, तीणइं भाजनि सूधउ आहार घालीइ ते पूतिकर्म कहीइ । अथवा आधाकर्मी आहारइ खरडिउ जे हस्तादिक तीणि हाथिई जे आहार विहरीइ; तेहे बादरपूतिकर्ममाहि आवइ । तेह भणी ते हस्तादिकइ वर्जिवउ ॥३५॥ हिव एह जि दोष आश्री वली विशेष कहइ छइ -
पढमदिणंमि कम्मं तिन्निय पूइकम्म पायघरं ।
पूड़ तिलेवं पिढरं कप्पइ पायं कयतिकप्पं ॥३६॥
पढम० ॥ कृतकर्मपाकं गृहं जीणइ घरि आधाकर्मी आहार पवित्र नीपनु हुइ, ते घरइ पिहलइ दिहाडउं आधाकर्मी कहीइ । तथा त्रिणि दिहाडा ते घर पूतिकर्म कहीइ । एतलइ च्यारि दिहाडा ते घर वर्जिवउं, इस्यिउ भाव । अथवा