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________________ ७२ अनुसन्धान-७३ ते दण्ड गति करतां करतां चारे दिशामां एक सरखी रीते भाषाप्रायोग्य द्रव्योने पराघात पाडे छे. मतलब के अन्य अनन्त अनन्तप्रदेशिक स्कन्धोने शब्दात्मक परिणामवाळा बनावे छे. तेथी बीजा समये शब्दात्मक भावनाथी वासित अनन्तगुण द्रव्यो साथे चारे दिशामां प्रसरतां भाषाद्रव्यो छ मन्थान रचे छे. त्रीजा समये आ मन्थानोनां आंतरां पूरातां सर्वलोक भाषाद्रव्योथी व्याप्त बने छे. आमां चावीरूप बाबत 'पराघात' छे. अचित्तमहास्कन्ध जो पराघात करी शकतो होत ओटले के अन्य द्रव्योमां स्वपरिणाम उत्पन्न करी शकतो होत तो चोक्कस ते पण त्रण समयमां लोकव्यापी बनी शकत. परन्तु ते पराघात करी शकतो नथी, तेणे पोतानां पुद्गलो द्वारा ज व्याप्त थवानुं होय छे. तेथी ते प्रक्रिया अनिवार्यपणे दण्डमांथी मन्थान बनवामां वच्चे कपाट अवस्थानो एक समय वधारे ले छे. अने चार समय वीती जाय छे. आ समाधान परथी समजाय छे के श्रीजिनभद्रगणि क्षमाश्रमण अने तेमने अनुसरीने मलधारी श्रीहेमचन्द्रसूरिजी अचित्तमहास्कन्धने अपराघाती अन्य स्कन्धोने स्वपरिणाम नहीं पमाडनारो गणे छे. - हमणां आनाथी जुदी ज वात वांचवा मळी. श्रीदशवैकालिकसूत्रनी श्रीअगस्त्यसिंहसूरिजीओ रचेली चूर्णिमां त्रीजा अध्ययनना प्रारम्भे ‘महत्’ना निक्षेपाना विवरणमां जणावायुं छे के — दव्वमहंतं अचितमहाखंधो, सो सुहुमपरिणताणं अणंताणं अणंतपदेसियाणं खंधाणं तब्भावपरिणामेणं लोगं पूरेति । जहा केवलिसमुग्घातो डंडं कवाडं मंथुं अंतराणि चउत्थे समये पूरेति, एवं सो वि चउत्थे समये सव्वं लोगं पूरेत्ता पडिणियत्तति, एतं दव्वमहंतकं ॥ श्रीदशवैकालिकसूत्रनी अन्य चूर्णि जे 'वृद्धविवरण'ना नामे ओळखाय छे तेमां पण आवो ज पाठ मळे छे तत्थ दव्वमहंतं अचित्तमहाखंधो भण्णइ, सो किर सुहुमपरिणामपरिणओ अणंताणंतपदेसिया खंधा तं तहाभावं परिणमंति जेण सव्वं लोगं पूरेति । जहा केवलिसमुग्घायादओ डंडकवाडमंथंतराणि य चउत्थे समये पूरेति, एवं सोवि चउत्थे समये सव्वं लोगं पूरेत्ता पडिणियत्तति, एतं दव्वमहंतं ॥
SR No.520574
Book TitleAnusandhan 2017 11 SrNo 73
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherKalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
Publication Year2017
Total Pages86
LanguageSanskrit, Prakrit
ClassificationMagazine, India_Anusandhan, & India
File Size6 MB
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