________________
अनुसन्धान-७०
गाय-बलद-भिंस कोउ न मारई, इनु बातई सोंगंध हमारइ । सेजा तिरथ सोउ तुह्म दीना, पेसकसी पुस्तक भी कीना ॥२४९।। करी फुरमान दीइ ततकाल, श्रीगुरु-आण वहइ निज-भाल । विनय कीरी बुलावइ सूरीस, दिन दिन बोधइ रे अधिक जगीस ॥२५०|| अकबर सीख ले(दे)ई जव वलीया, मन केरा मनोरथ सवे फलीया । श्रीपूज्य विहार करंता रे आवइ, नागुर नयर चुमासुं सुहावई ॥२५१॥ श्रीकल्याणविजय गुण-धीर, सनमुख जई प्रणमई गुरु हीर । भाव धरी रहइ श्रीगुरु-संगई, भगतइं सेव करइ मन-रंगिं ॥२५२॥ इणि अवसरि संघ-पती इंद्रराज, करइ विनती आवइ गुरु-राज । जिन-मुरति-प्रासाद कराया, कीजइ प्रतिष्ठा रे गछपति-राया ॥२५३।।
॥ इति श्रीहीरवीजयसूरि-अकबरप्रतिबोधनु ढाल ॥१२॥
____दूहा ॥ राग गुडी ॥ करवा प्रतिष्ठा जिनतणी, अह्मे आव्यु नवि जाय । पभणइं जगत्त्र-गुरु हीरजी, मोकलसिउं उवझाय ॥२५४॥ श्रीकल्याणविजय वाचकतणा, गुण जंपइ सूरीस । "एणि आवई अह्मे आवीया, ए जगि महा-मुनीस" ॥२५५।। देई आदेस चलावीया, श्रीउवझाय वइराट । करि सुप्रतिष्ठा आवजो, वेगि करी मुनिराट ॥२५६।।
॥ ढाल ॥
प्रणमी गुरु-पाय, श्रीकल्याणविजय उवझाय ।। चालइ चमकंतु, जिम गज-गति गज-राय ॥२५७॥ अतिशय महिमा करि, करतु खेम-कल्याण । रचतु महिमावन, लावन तणु रे निहाण ॥२५८।।