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अनुसन्धान-७०
___ आ तमाम, चारे रचनाओ 'दुहा' रूप रचनाओ छे. बे दुहा ने एक त्रुटक एवा माप के बंधारणमां रचायेली आ रचनाओ छे. ३-३ दुहाने एक कडी गणीए तो, पहेली 'सीमन्धरजिननमस्कार' नामनी रचना, पांच कडीनी छे. तेमां कर्ताए विहरमान जिन श्रीसीमन्धरस्वामी- वर्णन तथा वन्दन करेल छे. बीजी 'पंचतीर्थनमस्कार' नामक रचना पण पांच कडीनी छे. तेमां क्रमशः शत्रुजय, अष्टापद, समेतशिखर, उज्जयन्त अने अर्बुदगिरि एम पांच तीर्थोनी वन्दना छे. दरेक तीर्थ- शास्त्रवर्णित स्वरूप कविए बहु संक्षेपमां पण हृदयङ्गम शब्दोमां वर्णव्युं छे. आजे जैन सङ्घमां, प्रातः प्रतिक्रमणवेळाए के शत्रुञ्जयनी स्तुति-वन्दना थती होय त्यारे, "श्रीशत्रुञ्जय सिद्धक्षेत्र" थी शरु थतुं चैत्यवन्दन बोलाय छे तेना कर्ता कोण - ते, नामाचरणना अभावे, जाणमां नहोतुं. ते चैत्यवन्दन अहीं शत्रुञ्जयनी स्तवनारूपे छे, ते परथी तेना कर्ता विषे पण जाण थाय छे.
त्रीजी रचना 'शत्रुञ्जयनमस्कार' छे, तेमां शत्रुञ्जयतीर्थ-वन्दना थई छे. आमां शत्रुञ्जयमण्डन ऋषभदेवनी पूजानुं विशद वर्णन थयुं छे. त्रीजी कडीमां हाथी पर बेठेलां मरुदेवाना शिल्पनो निर्देश होवा उपरांत, कविना समयमां शत्रुञ्जय उपर १५६५ जिनबिम्बो होवानी नोंध दस्तावेजी छे.
चोथी रचनामां १७ कडी छे. तेमां क्रमशः २४ जिन, २० विहरमान जिन, पांच तीर्थ - बधांने नमस्कार कर्या पछी केटलांक अभिनव अन्य तीर्थोने स्माँ छे, जेमां शंखेश्वर, गोडी, थंभण, चिन्तामणि - ए ४ पार्श्वनाथ अने तीर्थो, पाटणना पंचासरा पार्श्व, तारंगा, वडनगरमां महावीर, नवखंडा, अजारा, कुलपाक, अन्तरीक्ष, अवन्ती पार्श्व, मक्षी, आरासण, राणकपुर, रामसेण, कुंभलमेर, चित्रकूट, भरुच, देवका पाटण, मालवदेशे वडवाणी गामे बावनगजा, डुंगरपुर, देलवाडा, वरकाणा, ब्राह्मणवाडा, लोटीणा, हस्तिनापुर, शौरीपुर इत्यादिनां नाम छे. पछीनी कडीओमां शाश्वत जिनबिम्बो विषे तथा १७० उत्कृष्टकालभावी जिनने, वर्तमानमां विचरतां जिन अने मुनिओने, पांच मेरु परनां तथा नन्दीश्वर द्वीपनां बिम्बोने नमस्कार कर्यां छे.
ते पछी २४ जिनना १४५२ गणधरोने, २४ जिनना साधु (२८ लाख ४८ हजार) अने साध्वी (४४ लाख ८६ हजार चार सो छ)ने नमस्कार छे. तो ५५ लाख ४८ हजार श्रावको अने १ क्रोड ५ लाख ३८ हजार श्राविकाओने पण प्रणमे छे.