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________________ अनुसन्धान-७० पन्नरस कोड बिंब वली, बइतालस कोडी । लाख अठ्ठावन सहिस अडयाल, प्रणम्यु कर जोडि ।। त्रूटक - भवनपति व्यंतर जोतकी ओ, असंख्य उदधि दीप मझारि । जिनप्रसाद जिनबिंबतणउ, तेहनउ न लहु पार ॥१२॥ हिवइ सतिरिसउ जिनविचार, उत्क्रष्टइ वारई । पांच भरथ पांच औरवत, हुं कहुं आपार ॥ ओकेके माहवदेह, वजय बत्रीस । पांचे मली संख्या सुणु, अक सत दो तीस ॥ . त्रूटक - नवसहिस कोडी साधु वंदिओ, वली केवलि नव कोडि । उत्तमकाले ओ सही, हुं प्रणमुं दोइ कर जोडी ॥१३॥ .. संप्रतिकालइ विहरमान, जिनवर जे वीस । दोय कोडि केवली दोय कोडि सहस मुनीस ॥ पांचे मेरे जिनभवन, पंचासी कहाय ।। दससहस (जिन)बिंब, गुणपार न लहाय ।। त्रूटक - बावन प्रासाद नंदिसरि ओ, बिंब वीस सहस नवसत अंक । सुर नर मुनिवर असुर नर, प्रणमि धरीय विवेक ॥१४॥ चउवीसइ जिन परिवार सार, गणधर पटाधारी । चउदइ सइ बावन वली, जे पु(प)र उपगारी ।। लाख अठावीस सहिस अडयाल, मुनिवर वैरागी । मन-वचन-काये करी, लइ संयमसुं लागी ॥ त्रूटक - लाख चउंयालीस च्यार सइं ओ, वली छयालीस हजार । षट् अधिक ओ माहासती, तस गुणनउ न लहु पार ॥१५॥ समकित मूल सहित श्राध, पंचावन लाख । वली. सहिस अडयालीस अधिक, ओ श्रावकनी भाख ॥
SR No.520571
Book TitleAnusandhan 2016 09 SrNo 70
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherKalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
Publication Year2016
Total Pages170
LanguageSanskrit, Prakrit
ClassificationMagazine, India_Anusandhan, & India
File Size11 MB
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