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अनुसन्धान-७०
चालउ सेनूंज जाइई, हर्षइ करउ जात्र ।
सूरजकंड करी सनान, निर्मल करउ गात्र ॥ त्रूटक - खीरोदिकनां धोतीयां अ, ओढण जादर चीर ।
कनक-कलस हाथि धरी, भरियां निर्मल नीर ॥१॥ सुकडि केसर घसीय घj, कचोलइ भरीइ । युगादिदेव पूजा करी, भवसागर तरीइ ।। चंपक-केतक-मालती, माहिं दमणउ सोहइ ।
कुसुम-माल कंठि ठवउ, जिनना मन मोहिइं ॥ त्रूटक - नादपूजा करउ भावस्युं ओ, नाटिक नविन विज्ञान ।
सविपद नरनारि वरइ, ते पामइ बहुमान ॥२॥ ऋषभ-भुवन रुलीआमणुं, जाणइ हरिनुं ठाम । मेरतणी परे अचल अह, विमलाचल नाम || हस्तिखंधिइ मरुअदेव, बइठीं दीइ हेल ।
सुर-नर-नारि सहु मली, पूजइ रंगि रेलइं ।। त्रूटक - सेजेंज-बिंब संख्या सुणउ अ, हुं कहुं मननइ कोडि ।
पनरसनइं पांसठि वली, नहि को ते सम जोड ॥३॥ सेज-आबु-समेतसिखरि, अष्टापद सोहिइ । रैवति वंदु नेमनाथ, दीठइ मन मोहिइ ॥ पंच तीर्थ ओ पंच मेर, जगमांहि सार ।
भावइ वंदुं भविय लोय, पामउ भवपार ॥ त्रूटक - ऋषभजिणंद समोसर्या अ, पूर्व नवाणु वार ।
पुंडरिकस्युं मुनिवरा, बहु पाम्या भवपार ॥४॥ चउइंद्र आदि देइ सूर, सेवा सारइं । तिहुयण तारण वीतराग, भवपार उतारइं ॥
६. शिवपद ।