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जुलाई-२०१६
त्रूटक - साव सौवर्णमइ प्रासाद अछड्, रयणमइ जिनबिंब सार ।
भरहराय भावइ करी, हुं प्रणमुं ते वारोवार ॥२॥ समेतशिखर समोसर्या, सिद्धा जिन वीश । वीसइ ढूंकइ विवधि परि, वंदु निसदीस । मुज मनि ओह उमाहलुं, गिरि जात्रा जाउं ।
पाप ताप दूरइ करी, इम निर्मल थाउं । जूटक - ऋषभदेव श्रीनेम विना, वासुपूज्य महावीर ।
अवर तीर्थंकर अणि गिरि, पाम्या भवतुं तीर ॥३॥ उजन्तगरि उंचपण, वळी गाउ सात । प्रथ्वीजइ प्रासाद करउ, साजण अवदात ॥ यादवकुलि श्रीनेमनाथ, जे बालब्रह्मचारी ।
सतीसिरोमणी राजमती, तजी जेणइ नारी ॥ त्रूटक - त्रण कल्याणक अहींआ हुआ ओ, दीक्खा-नाण-निरवाण ।
भावसहित भगति नमुं, बावीसमुं जिनभाण ॥४|| अरबदगिरि उपरे अनेक, जिनबिंब प्रासाद । विमलसाह वसही करी, सुरगरिस्युं वाद ॥ वस्तुपाल नइ तेजपाल, जगमांहि सार । लुणकवसही प्रासाद करी, पाम्या भवपार ॥ तपगच्छमंडण हीरजीओ, विमलहर्ष उवज्झाय । तास सीस मुनि प्रेमनइ, आपउ सिवपुर ठाय ॥५॥
॥ इति श्रीपंचतीर्थनमस्कार समाप्त ॥
(३) शत्रुजय-नमस्कार
पहिलं प्रणमुं प्रथमनाथ, सेर्जेज गरिराय ।
नयणे पेखउं आदिदेव, सोवर्णमइ काय ॥ ५. पृथ्वीजय नामनो प्रासाद ।