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अनुसन्धान-७०
बोलइ बिरुदाली, भोजकनां बहू वृंद । गंध्रव गुण गावइ, नाटक नव नव छंद ॥२७१।। गाजइ गयणंगणि, मादलना धोंकार । पंच शबदां बाजई, भेरीतणा भेंकार ॥२७२।। सुरणाई नफेरी, वाजइ ढोल नीसाण । रणझणती कंसालां, भुंगल-नाद वखाण ॥२७३।। मणि-सोअण-भूषण-भूषित-तनुं सुकुमाल । सहि वदीइं मंगल, कोकिल-कंठी रसाल ॥२७४।। केई चडीया पाला, नर-नारीना वृंद । गुरु-वदन निहालइ, पूरु पुंनिमं चंद ॥२७५।। गुरु महीमा-मंदीर, कीधु नगर-प्रवेश । दिन दिन अति उछव, होवई नयर विसेस ॥२७६॥ मंडप बहू रचीया, जाणइं इंद्र-विमान । जल-जात्र-आडंबर, करइ सुर-नर गुण-गान ॥२७७॥ सुभ-दिन सुभ-लगनि, थापि इंद्र-विहार । श्रीविमल जिणेसर, मूल-नायक जयकार ॥२७८।। संघपति भारहमल, नामइं पास जिणंद । अजयराज अनोपम, पूजु पढम जिणंद ॥२७९।। छजू संघविण सुखकर, मुनिसुव्रत जिनदेवो । सुभ मुहुरत संठविय, सुर-नर करइ नित सेवो ॥२८०॥ वाचक-मुकता-मणि, श्रीकल्याणविजय उवझाय । करि हरखई प्रतिष्ठा, इंद्रादिक गुण गाय ॥२८१॥ इंद्र-विहार अनोपम, दीठइ हुइ आणंद । जाणइ इंद्र-भचनथी, अवतरीओ सुख-कंद ॥२८२।।