SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 53
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ अनुसन्धान-६९ लाखीणी तनु नीछट गोरी, पहिरी कनकतणी कडि-दोरी । सुकुलीण उरि धिगारव जोरी, सुंदर नारि रमई चिति चोरी ॥२९॥ आसण भोगतणां चउरासी, जाणइं कोकतणउ अभ्यासी । नागर-वंसीय लील-विलासी, जस-करपूर दिगंतर वासी ॥३०॥ जोवत नगर फिरइं सवि टोडई, वेश्याइं दीठउ मन-कोडई । वांकडली निय मूछि मरोड, इणि जगि एह समउ नहीं जोडइं ॥३१॥ देखीय कोसितणई मनि भावई, लोक सहू जसु कीरति गावइं । चिंतई ए नर अम्ह वसि आवई, सोवन कोडि-गमे विलसावइं ॥३२॥ चिंती वात इसी मनि साची, जोवई गरवतणइं मदि माची । थूलिभद्र पुरुषतणई गुणि राची, तेडई निय घर सुंदरि नाची ॥३३॥ विकसिय नयण जुई सुकुमारा, घूमई नयनतणी मदि तारा । देखीय रूप-रतन्न कुमारा, चंचल-चित्त हुई पण-दारा ॥३४॥ सखि जंपई "सुणि कोशि! अनाडी, इम नवि दीजइ आपण पाडी । सुंदर पुरुषतणां धन ताडी, तुं किम लेइसि रे जग-लाडी ॥३५॥ गणिका-जाति कही निसनेही, लेई सोवन दीजइं देही । ए मुझ सीख सुणे गुण-गेही, अम्हथी तुं वलि स्युं ससनेही" ॥३६।। ॥ दूहा ॥ निसुणी वचन सखीतणां, सुगुणी चिंतई नारि । ए दीसई सवि निरगुणी, न लहई सुगुण-विचार(रि) ॥३७|| जोवन-वय घरि पवर धण, वलि मन-वंछित भोग । मई पूरव पुण्यइं लाउ, मंत्री-सुत-संयोग ॥३८॥ इणि जगि सुंदर मूढ नर, तेहस्युं न करूं संग । गुण विण नवि को आदरई, सींबलि फूल सुरंग ॥३९।। इम चिंतवी साहमी गई, सुंदरि भणती नाम । आदर करि आसन ठव्युं, रतन-जडित अभिराम ॥४०॥ ॥ ढाल - ४ ॥ बइसई थूलिभद्र आसण-धारा, सुंदरि कोसि करई सिणगारा । थापीय कुच-विचि माणिक-हारा, गिरि-विचि गंगतणी जल-धारा ॥४१॥
SR No.520570
Book TitleAnusandhan 2016 05 SrNo 69
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherKalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
Publication Year2016
Total Pages198
LanguageSanskrit, Prakrit
ClassificationMagazine, India_Anusandhan, & India
File Size12 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy