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________________ मार्च - २०१६ इति सूणी गोयम पबूधो. पंचशत साथि । दीख दीधी सूरिपद दइ वीरजिन हाथिइं ॥२०॥ वी०॥ लोकपाल कुबेर दीनां धर्मउपगरणं । यतनस्यूं जइ यति न धरइ होसइ अधिकरणां ॥२१॥ वी० ॥ सुणी आयु अग्निभूती तिम ज गर्व धरी । वालस्यूं हूं निज सहोदर तर्कवाद करी ॥२२॥ वी० ॥ तिमज वीरि बोलाइ लीनो "कर्मसंदेही" । कर्म रूपी जीअ अरूपी बंध गति केही ॥२३॥ वी० ॥ वीर भासइ सुखदुक्खादिक जीव बहू भांती । कर्म विण ए केंणे चितरिउ राखि मति जाती ॥२४॥ वी० ॥ परिवारस्यूं बूझवी दीख्यो वायुभूति सुणी । "सोइ तनु सो जीव" संसय भाजि त्रिजगधणी ॥२५॥ वी० ॥ नीरथी पंपोर्ट परि सो देहथी ऊपजी । इस्यूं ज तूं चिंति जाणइ कुमति ति इह भजी ॥२६॥ वी० ॥ जीव इंदिय गया पूठई विषय चिंत धरइ । देहथी जु गयु इंदिय पुरुष किम समरइ ॥२७|| वी० ॥ तिमज सो परिवारि दीख्यो विगते सुणि आयु । "भूत इह उसे नहीं" जाणुं सून्य जग भास्यु ॥२८॥ वी० ॥ विगत सुण तिं झूठ बुझो भूति जग भरिउ । चंद रवि प्रमुख देखह प्रतखि पांतरिउ ॥२९॥ वी० ॥ __ ढाल || राग गुडी || तिमतिम समकितधर थोडिलउ ए ढाल ॥ भावि पटोधर वीरनो, सामि सुधर्मा मुणिंद । समवसरणि जब आवीउ देखि सुर नर इंद ॥३०॥ भावी० ॥ वीरजिणिदिं बोलावीउ, ए संसय तुझैं जोइ । "एणि भवे देहिअ जे जस्यो; सो परि भवि तिम होइ" ॥३१॥ भावि० ॥ काज हुइ कारणसम, यम जवथी जव होइ ।। सालि थकी जव किम होइ, मुझ उर भंति न कोइ ॥३२॥ भावि० ॥ * ओर-अन्य-बीजुं ।
SR No.520570
Book TitleAnusandhan 2016 05 SrNo 69
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherKalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
Publication Year2016
Total Pages198
LanguageSanskrit, Prakrit
ClassificationMagazine, India_Anusandhan, & India
File Size12 MB
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