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मार्च - २०१६
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माहाराज पदी तुमकू फलै, हरि गुरुकी बगसीस,
यामैं नही सनेहता, मानो विसवावीस... ५०
(अनंत उपमा लायक सुखधाममां बिराजमान पूज्य पुरुष, जेमनुं मुख सरोजसमुं छे अने ब्रह्मज्ञानरूपी विमळ वाणी उच्चारे छे, आप स्वरूपे अवतार धारण करी सार असारने वर्णवे छे, श्री हरि गुरुनी कृपा बक्षीसना कारणे महाराज पद फळी रयुं छे, आ वात मात्र अमारा स्नेहनी ज नथी पण पूर्ण विश्वासनी छे.) छंद - बुजंगी -
गुरु मोर स्वामी दिलसुधरामं, कटै ताहि दरसं नरकादि ग्राम, दिपै ज्युं दनेसं सहि खांतिकारी, सदा ग्यांनरूपं प्रकासो ज भारी...
.................. (अहिं १ चरण ओछु लागे छे.) ईन्द्री जीति सूरा जपै राम नामं, नमो दिलसुद्धरांमं नमो दिलसुद्धरांमं ५१ नमो दिल सुधं सबै धरम मंडे, नमो ब्रह्म रुपा सकल काम खंडे, मनो बाचपार जिनहैं बेद गावै, आदि अंति ओक सबै संत ध्यावै, अखंडं अनभं ब्रह्म स्वरूपा, निराकार स्वामी भक्तादि भूपा, मेटो नरकवाल देवो राम नामं, नमो दिलसुधरांमं नमो दिलसुधरांमं... ५२
__ (मारा गुरु स्वामी दिलसुद्धरामजीना दर्शन करतां नर्कवासनी यातना टळी जाय छे, जेवी रीते दिनेश/सूर्य पोतानी कान्तिथी शोभे छे तेम सदाये ज्ञानरूपी प्रकाश तेमनामां झळहळे छे, ईन्द्रियजीत शूरा अवा रामनाम जपनारा श्रीदिलसुद्धरामजीने हुं वन्दन करूं छु.) कवित्त - .
दिलके वडे दयाल असे नही तीनो पुरमैं, लगे करण प्रतिपाल आप सतगुरुजी उरमैं, सुमरों रांम अखण्ड पलक लय थकै न जाकी, धरम ध्वजा फरराई धरम मई मूरति ताकी, राखे आप ले सरन काल के भये सब हारे, . मरम बतायो सार धार भव जल की त्यारे,