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जून २०१५
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प्रथम रचना वैराग्यकुलकम् प्राचीन छे. शब्दप्रारम्भे नकार आमां छे. मध्यमां 'न' श्रुति पण छे (एन्हि, नाओ, गिन्हामि वगेरे). आ प्राचीन प्राकृत (मागधी, अर्धमागधी) नुं लक्षण छे. संस्कृत साथे निकटता आ रचनानी भाषामां बची छे, जोके देश्य शब्दो पण छे ज. सूडिति, वड्डा, गोसे जेवा शब्दो प्राचीन प्राकृतना छे. गा. ३२मां 'पुरिसो' छपायुं छे त्यां 'पुरिमो' होवानी वधु सम्भावना छे. तो हुं रत्नाधिक होवाना कारणे सर्व मुनिओमां पुरुष होत" एवो अर्थ विचित्र गणाय; '... सर्व मुनिओमां पुरिम = प्रमुख, आगळ पडतो होत " एवो अर्थ सुसंगत थाय. हस्तप्रतना वाचनमां 'मो' अने 'सो' अक्षरो वांचतां गरबड़ थई शके छे.
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'प्राचीन पांच रचनाओ' अपभ्रंशकालनी तथा तेना नजीकना समयनी छे. पहेली बे कृतिओ अपभ्रंश- गूर्जरना सन्धिकाळनी जणाय छे बन्नेमां स्वरूप-कल्पन- शब्दावलीनी समानता जोतां बन्नेना कर्ता एक ज होवानी शक्यताने पुष्टि मळे छे. ए ज रीते त्रीजी अने चोथी रचनानी समानता पण देखाई आवे छे. पांचमी रचनामां गरबड़ जेवुं लागे छे. १२मी गाथाथी विषय अने छन्द बन्ने बदलाय छे. ११मी गाथामां उपसंहार छे, वळी कळशना रूपनी गाथा छे. ११ गाथा अपभ्रंशनी छे, पछीनी गाथाओ अपभ्रंशनी छे पण प्राकृतनी वधु नजीक छे. कृति ५, गा. ४मां 'पच्छयावु' छे त्यां 'पच्छायावु' शुद्ध पाठ समजाय छे. गा. २६ना उत्तरार्धनो भाव आवो कंइक समजाय छे. हे जीव, जेणे करंबो खाधो ते विलम्ब पण सहन करशे. आ अर्थने ध्यानमां लेतां चोथुं चरण आम वांची शकाय जिणि जीव! करंबठ खद्ध एव, सहिस ( स्स) इ स विलंबउ सययमेव ।
'द्रव्यपर्याययुक्ति' नामक कृतिमां द्रव्य-गुण-पर्याय, व्यवहार-निश्चय जेवा तात्त्विक विषयनी विचारणा थई छे ते मननीय छे. स्याद्वादने पण स्याद्वाद लागू पडतो होय तो 'स्याद्वाद साचो पण अने स्याद्वाद खोटो पण' एवं सिद्ध थाय ! अथवा 'स्याद्वाद बधी वस्तुने लागू पडे अने न पण पडे' एवं तारण नीकळे. बन्ने रीते स्याद्वाद नबळी पडे. आ ज मुद्दाने आगळ लंबावतां 'पाप कर्तव्य नथी अने कर्तव्य पण छे 'एवो निष्कर्ष पण काढी शकाय ! जो स्याद्वादने स्याद्वाद लागू न पडे एम कहीए तो स्याद्वादनो सिद्धान्त अधूरो
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अनुसन्धान-६७
ठरे ! आ गूंचनुं सुन्दर समाधान कर्ताए आ निबन्धमां आप्युं छे. आ समाधान आवुं छे : स्याद्वादमां एकान्तवादने स्थान नथी तेथी स्याद्वाद बधे ज लगाडवो एवो एकान्तवाद अमने स्वीकार्य नथी. जे स्थाने स्याद्वाद लगाडवो योग्य नथी त्यां न ज लगाडवो जोईए. जे अनिच्छनीय छे त्यां स्याद्वाद भले न लागे, त्यां एकान्तवाद भले रह्यो ! आने आपणे आ रीते पण मूकी शकीए : एकान्तवाद सर्वथा हेय छे एवो एकान्तवाद अमने इष्ट नथी !
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प्रस्तुत रचनामा सम्पादके श्रमपूर्वक संशोधन कयुं छे, तेम छतां केटलांक स्थान सम्मार्जनने पात्र रहे छे. पृ. २०, पं. ८ 'पर्यायान्तरेणाऽस्तित्वरूपे' छे त्यां '०रेणानस्तित्व०' अथवा तो '०रेण नास्तित्व०' जेवो पाठ बंधबेसतो थाय. * पृ. २०, पं. नीचेथी ८ 'सङ्गतिमङ्गति' छे त्यां [न] उमेरवो पडे एम छे. पृ. २५, पं. ११ 'ऽनित्यमेव' त्यां शङ्कासूचक प्रश्नचिह्न मूक्युं छे. अहीं कर्तानो आशय एवं कहेवानो छे के सिद्धोनुं ज्ञान आकाशनी जेम वस्तुगत्या नित्य छे; आथी 'ऽनित्यं' नहीं पण 'नित्यमेव' पाठ कर्ताने इष्ट होय. पृ. २९, पं. नीचेथी १४ न ह्येकान्तदृष्टापि' छे त्यां '०दृष्ट्यापि' स्वीकारीए तो अर्थसङ्गति विशेष सुगम थाय.
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वागडपद्रपुरमण्डन आदिनाथ स्तवनना श्लो. १मां श्रियां'ने स्थाने 'श्रिया' वांचवं जोईए. श्लो. ६मां 'नाऽवलोके' (?) मां शङ्का नथी. परोक्ष भू. का. मां कर्मणि/ भावे प्रयोग होय तो 'अवलोके' रूप सङ्गत बने. ' श्लो. ८मां 'ऽस्महं' छपायुं छे ते प्रूफवाचननी भूल हशे 'ऽस्म्यहं' होवुं घटे
वृन्दावनकाव्यनी एक अप्रगट टीका आ अङ्कमा प्रकाशित थई छे. जैन विद्वानोना शुद्ध साहित्य प्रेमनोपरिचय करावतुं साहित्य पुष्कल छे. साहित्यक्षेत्रे जैन- अजैन जेवो भेद जैन साहित्यकारोए क्यारेय नथी राख्यो. अजैन साहित्यनुं अध्ययन, विवेचन, संरक्षण बधुं ज तेमणे कयुं छे. आजे पण जैन ज्ञानभण्डारोमा विश्वना कोई पण विषय के धर्मनुं साहित्य प्रेमथी * नास्तित्वं पर्यायान्तरेणाऽस्तित्वरूपे परिणमति जैन मते कोईपण वस्तुनो अभाव अनो सर्वथा विनाश नथी होतो, अनुं बीजा स्वरूपे परिणमन मात्र होय छे, जुओ भग. १.३.६ मां प्रस्तुत पाठनी टीका. सं. + "हराद्याः समर्था मया नाऽवलोके मां परोक्ष भू.का.मां के बीजी कोई रीते 'अवलोके'नी रूपसिद्धि शक्य न होवाथी प्रश्नचिह्न करेलुं छे. सं.
ए पाठ बराबर ज छे.
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