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________________ 18 दीवबन्दिरस्थ- श्रीविजयप्रभसूरि प्रति प्रह्लादनपुरात् पण्डितलालकुशलस्य लेख:- मुनि त्रैलोक्यमण्डनविजय १४९ देवकपत्तनस्थ-श्रीविजयप्रभसूरि प्रति साहिज्यपुरतः पण्डितहीरविमलस्य लेख:- मुनि त्रैलोक्यमण्डनविजय १५२ पुरबन्दिरस्थ-श्रीविजयप्रभसूरि प्रति रामदुर्गत: पण्डितकल्याणसागरस्य लेख: - मुनि त्रैलोक्यमण्डनविजय १६३ जीर्णदुर्गस्थ-श्रीविजयप्रभसूरि प्रति मालेपुरात् पण्डित-आगमसुन्दरस्य लेख: - मुनि त्रैलोक्यमण्डनविजय १७३ शोधलेख: जैनों का प्राकृत साहित्य : एक सर्वेक्षण - प्रो. सागरमल जैन १८३ ग्रन्थावलोकन : निर्ग्रन्थ परम्परानी अतीतनी शोधयात्रानो परिपाक - उपाध्याय भुवनचन्द्र म. २०२ कहावली : एक सीमास्तम्भ रूप प्रकाशन – उपाध्याय भुवनचन्द्र म. २०४ विहंगावलोकन - उपाध्याय भुवनचन्द्र म. २०९ पत्रचर्चा - उपाध्याय भुवनचन्द्र म. २१२ पत्रनो प्रतिभाव - मुनि त्रैलोक्यमण्डनविजय २१६ सम्पादकीय नोंध - विजयशीलचन्द्रसूरि २१९ वर्धमान जिनरत्नकोश अंगे विनन्ति २२१ पत्र आर्थिक सहयोगः श्रीभावनगर जैन श्वे. मू. पू. तपा संघना ___ ज्ञानद्रव्यमांथी आ ग्रन्थ-प्रकाशननो लाभ लीधेल छे. - - Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.520561
Book TitleAnusandhan 2013 03 SrNo 60
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherKalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
Publication Year2013
Total Pages244
LanguageSanskrit, Prakrit
ClassificationMagazine, India_Anusandhan, & India
File Size9 MB
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