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अनुसन्धान ५२
काल छे. परमाणुनी परिवर्तन क्रिया ज 'समय' कहेवाय छे. समय क्रियानो समुदाय आवलिका छे, आवलिकानो समुदाय उच्छ्वास छे. उच्छ्वासने मापवामां आवलिका क्रिया काल कहेवाय छे अने आवलिकाने मापवामां परमाणु परिवर्तनक्रियारूप समय काल कहेवाय छे. आ ज रीते आगळ समजवुं. लोकव्यवहारमां पण ‘गोदोहनकाल' 'पाककाल' आदि कालव्यवहार क्रियामूलक ज छे. ओक क्रिया बीजी क्रियाने परिच्छिन्न करती 'काल' संज्ञा पामे छे. आना उत्तरमां कालद्रव्यवादी कहे छे के ओ साचुं के क्रियाकृत ज आ व्यवहार थाय छे – ‘उच्छ्वासमात्रमां कर्तुं, मुहूर्तमात्रमां कर्तुं' इत्यादि. परन्तु पोतानी रूढ उच्छ्वास, मुहूर्त, पलक आदि संज्ञाओने 'काल' नाम विना कारण तो अपायुं न ज होय. तेनुं कारण छे कालद्रव्य, अन्यथा कालव्यवहारनो लोप थई जाय. जेम देवदत्तने 'दण्डी' नाम अकस्मात् कारण विना नथी अपातुं परन्तु तेनुं कारण छे अने ते कारण छे दण्डनो सम्बन्ध. तेवी ज रीते उक्त व्यवहारोमां 'काल' नाम माटे कालद्रव्य मानवुं आवश्यक छे.
सामान्य रीते कालद्रव्यनी स्थापना माटे उपरना तर्को आपवामां आवे छे. आ तर्को पण परीक्षणीय छे. उदाहरण तरीके, धर्म अने अधर्म गति अने स्थितिमां सहायक कारणो मनायां छे. तेवी ज रीते कालद्रव्यने पण वर्तनामां सहायक कारण मानवुं जोइओ. जो कालद्रव्यने वर्तनामां सहायक कारण तरीके न स्वीकारो तो धर्म अने अधर्मने गति अने स्थितिमां सहायक कारण तरीके न स्वीकारवानी आपत्ति आवे. आ तर्क सामे अ वांधो ऊठावी शकाय के धर्म-अधर्म अने कालने समान भूमिकाओ न मूकी शकाय. गति अने स्थिति कादाचित्क छे. कोइक वखते ओक पदार्थ गतिमां होय छे अने कोइक खते ते ज पदार्थ स्थिर होय छे. जे कादाचित्क होय तेनी उत्पत्ति होय अने ते उत्पत्तिनां कारणो होय. जे कादाचित्क न होय तेनी उत्पत्ति पण न होय अने उत्पत्तिनां कारणो पण न होय. वर्तना अनादि अनंत छे. ते सतत चाल्या ज करे छे. ते अटकीने चालु थती नथी. ओटले तेने पाछी चालु करवा माटे कोई कारणनी आवश्यकता नथी. ओटले कालद्रव्यना समर्थनमां आ जे तर्क आयो छे ते टके ओवो नथी. आ प्रमाणे सूक्ष्म परीक्षा थवी जोइओ.
दिगम्बरोना मते कालद्रव्यनुं निरूपण - दिगम्बर मते कालद्रव्य