________________
डिसेम्बर २००८
जहां से मिले वहां से उसका ग्रहण करना चाहिए । उसे निज जीवन में व्याप्त करना चाहिए । शास्त्रकारों ने यही किया है ।
यदि गौरपूर्वक दर्शनों का व शास्त्रों का अध्ययन किया जाए तो स्पष्टतया दिखता है कि प्राय: सभी परम्पराओं की असर एक-दूसरे पे है। हमारी जैन परम्परा का मुख्य उद्देश्य-ध्येय अहिंसा है । वह जहां से भी सिद्ध हो हमें उसका स्वीकार करना ही चाहिए ।
पन्द्रह कर्मादान भी हिंसास्वरूप ही है। उनसे बचना-उनका त्याग करना अहिंसा है । और हमारा लक्ष्य तो अहिंसा ही है । • कुलपरम्परा से जो लोग इन्हीं में से कोई व्यवसाय करते रहे हो तो इसका
मतलब यह कैसे हो सकता है कि वह व्यवसाय अनिषिद्ध व मान्य है ? वह व्यवसाय अनुचित ही है । उसे त्यागना ही चाहिए। चीजों का इस्तेमाल करना और उनका व्यवसाय करना - इन दोनों में बहोत फर्क है । कोई व्यक्ति घी-तेल-कोयला आदि का इस्तेमाल करती है तो वह अपने लिए / घर के लिए अल्प मात्रा में कुछ लाती है । उससे हिंसा होने का सम्भव भी अल्प है। जब कि उसका व्यवसाय करने में वह मात्रा कई गुना बढ जाती है । हिंसा भी बढ जाती है । तो फिर यह कहना कितना उचित होगा कि - 'दूसरों द्वारा बनाई गई चीजों का इस्तेमाल हम करते हैं तो खुद को इन चीजों के बनाने व बेचने का निषेध तर्कसंगत नहीं लगता' ? । उदाहरणतया - किसी व्याधि आदि के कारण कभी किसी को कोई हिंसा जनित औषध यदि इस्तेमाल करना पड़े तो क्या उस औषध का व्यवसाय भी अनिषिद्ध व मान्य हो जाएगा ?। भगवान महावीर कुम्हार-लोहार आदि अनेक लोगों के निवासस्थानों में ठहरते थे । और उन्होंने किसी को अपना व्यवसाय त्यागने का उपदेश नहीं दिया - यह बात अर्धसत्य है । वास्तव में भगवान के काल में जैन कुल - जन्म से जैन बहोत कम थे। भगवान सब वर्ग के लोगों को धर्म का - अहिंसा का उपदेश देते थे। उन्हें साधु धर्म / श्रावक धर्म बताते थे । फिर जो कोई व्यक्ति धर्म समझ लेता था वह अपने
Jain Education International
For Private & Personal Use Only
www.jainelibrary.org