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जान्युआरी-2007
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(४) सम्पादकीय टिप्पणी : चिन्तन । अनुसन्धान अंक ३६ सन् २००६ के अंक में परयोगीराज श्री आनन्दघनजी अष्टसहस्त्री पढ़ाते थे शीर्षक लेख प्रकाशित हुआ है उस विद्वान् सम्पादक आचार्य श्री विजयशीलचन्द्रसूरिजी महाराज ने निम्न टिप्पणी लिखी है :सम्पादकनी नोंध :
एक बीजी विशिष्ट वात ए नोंधवी छे के अमारा परमगुरु शासनसम्राट विजयनेमिसूरि महाराज, चरित्रलेखन करवानो प्रसंग आव्यो, त्यारे तेमना जीवननी दस्तावेजी नोंधनां पृष्ठो फेरवतां एक विलक्षण वात नोंधायेली मळी आवी. ते वात आवी छे : "तपगच्छना धुरन्धर अने उद्भट विद्वान् उपाध्यायश्री धर्मसागरजी महाराज, आनन्दघनजी पासे भगवतीसूत्रनी वाचना लेता हता. पोते दीक्षा तथा वयमां वडील अने आनन्दघन घणा नाना, छतां तेमने पाटला पर बेसाडी पोते विनयपूर्वक सामे बेसीने वाचना लेता हता."
अलबत्त, आ वात दन्तकथा छे के हकीकत, तेनो निर्णय करवानुं कोई साधन नथी ज. परन्तु नेमिसूरिमहाराज पासे परम्परागत आ वात आवी होई ते साव निराधार होय तेम पण मानवू ठीक नथी.
धर्मसागरजीने भगवतीसूत्र न आवडतुं होय ते तो शक्य ज नथी; पण आनन्दघनजी पासे कोई विलक्षण रहस्यबोध हशे, अने ते कारणे ज आवा वृद्ध पुरुष पण तेमनो लाभ लेवा प्रेराया हशे एम बनवाजोग छे. अस्त. -शी.]
यह सौभाग्य की बात हो सकती थी कि कल्पसूत्र टीका किरणावलीकार श्री धर्मसागरोपाध्याय जैसे विद्वान् लाभानन्द / आनन्दघनजी के पास भगवतीसूत्र की वाचना लेते थे ।
किन्तु इस कथन में सबसे बड़ा बाधक समय बन रहा है क्योंकि दिग्गज विद्वान् उपाध्याय श्री धर्मसागरजी का साहित्य सर्जनाकाल १७वीं शताब्दी के प्रथम दशक से १६५० तक माना गया है और इनका स्वर्गवास काल संवत् १६५३ । स्व. श्री मोहनलाल दलीचन्द देसाई लिखित जैन
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