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जान्युआरी-2007
खरतरगच्छ दीक्षा नन्दी सूची में (जो कि बीकानेर बड़ी गद्दी, आचार्य शाखा और जिनमहेन्द्रसूरि मण्डोवरी शाखा का) इन नामों का उल्लेख न होने से स्वयं संदेहग्रस्त था कि यह परम्परा जिनराजसूरि परम्परा, जिनसागरसूरि परम्परा और जिनमहेन्द्रसूरि की परम्परा में नहीं थे किन्तु किस परम्परा के अनुयायी थे यह मेरे लिए प्रश्न था । किन्तु पंचकल्याणक पूजा में कवि ने स्वयं यह उल्लेख किया है :
श्री अक्षयजिनचन्द्रं पंचकल्याणयुक्तं सुनिधिउदयवृद्धि भावचारित्रनन्दी | भवजलधितरण्डं भक्तिभारैः स्तुवंति अविचलनिधिधामं ध्याययन्प्राप्नुवन्ति ॥ १ ॥ गणाधीशौदार्यो गुणमणिगणानां जलनिधिः गभीरोभूच्छ्रीमान्प्रवरजिनराजाक्षगणभृत् सुरिन्द्रस्तत्पट्टे धुमणिजिनरंग: सुरतरुः बृहद्रच्छाधीशो खरतरगणैकाम्बुजपतिः ॥ २॥ क्रमादायातं श्रीजिनअखयसूरीन्द्रगणभृदभून्नृणां तापं तदुपशमनं पूर्णशशिभृत् गभस्तिस्तत्पट्टे भविकजसुबोधैकरसिको भुवौ विख्यातं श्रीप्रवरजिनचन्द्रो विजयते ॥३॥
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अर्थात् जिनराजसूरि के पश्चात् शाखाभेद होकर जिनरङ्गसूरि शाखा का उद्भव हुआ । जिनरङ्गसूरि परम्परा में श्रीजिनाक्षयसूरि के पट्टधर श्रीजिनचन्द्रसूरि के विजयराज्य में यह पूजा रची गई । चारित्रनन्दी की परम्परा जिनरङ्गसूरि शाखा की आदेशानुयायिनी रही। इस शाखा की दफ्तर बही प्राप्त न होने से इस परम्परा के उपाध्यायों का दीक्षा काल का निर्णय नहीं कर सका ।
१९वीं शताब्दी के अन्त में और २०वीं शताब्दी के प्रारम्भ में काशी में चारित्रनन्दी और जिनमहेन्द्रसूरि अनुयायी नेमिचन्द्राचार्य और बालचन्द्राचार्य कुशलपश्यति, जैन विद्वानों में विख्यात थे अर्थात् इनका बोलबाला था । इसी समय के विजयगच्छीय उपाध्याय हेमचन्द्रजी का
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