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अनुसन्धान-३८
श्रीविजयसेनसूरि निज करे ललना,
बिंब प्रतिष्ठे हो श्रीश्रेयांस आधार, पू० ॥२॥ तिहां प्रभू बिंब बहु दिन रह्यं ललना,
महिमावंत हो पूजा सत्तर प्रकार, क० । एकसो चौदउ हो वर्ष अभिराम, तेहवें वागड देशमां,
आडिसर नयर हो सुखठाम, पू० ॥३॥ नवो देवल संघे तिहां को ललना,
___ मूलनायक हो प्रतिमा नहें एक, क० । इम विचारी पाटणथी ललना,
पधरावो हो संघ राखेवा टेक, पू० ॥४॥ संवत सतर ब्यासीइं ललना,
__ श्रावण सूदि हो पंचमी वार सोम, क० । शुभ दिन महुरत थापीउं ललना,
खेला रस हो नृत्य करता भूमि, पू० ॥५॥ ढोल निसांण ते वाजतें ललना,
गावे गोरी हो मधू स्वरगीत, क० । इम अनेक आडंबरें ललना,
बेसार्या हो देहरें सुभ रीत, पू० ॥६॥ बावना चंदन घन घसी ललना,
केशर सूकड हो माहि रंगरोल, क० । घाली कचोलें पूजा करें ललना,
भावें भावना हो फरति ओलाओलि, पू० ॥७॥ तुं माता तुं ही पीता ललना,
तु ही बंधु हो जगपालक नाम, क० । भवसायरथी मुज उधरो ललना,
अविनाशी हो सुख दीजें धाम, पू० ||८|| मुज अपराधी सम जना ललना,
तिं तार(रि)या हो नरनारिना कोडि, क० । हिव राखी सेवक भणी ललना,
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