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(ग्रन्थागार) भारतमां नथी ! ( भारतमां होत तो तेना हाल पण भाण्डारकर जेवा थात ! )
अंग्रेजो अने अंग्रेजियतनी मानसिक गुलामी, एक भारतीय लेखक पासे केवुं लखावी शके छे ! आवा लोकोने पूछी शकाय के इराकमां सङ्ग्रहालयोमांनी प्राचीन सभ्यताओ साथै सम्बन्ध राखती मूल्यवान् सम्पत्ति साथे अमेरिकी तथा ब्रिटिश लोकोए जे चेडां कर्यां : तोडफोड तथा लूंट : ते मुद्दे तमे शुं कहेशो ? शुं ए चेडां, भारतीयोनी तुलनामां, ते गोरा लोकोने वधु सुशिक्षित पुरवार करे छे ? पोताना ए लेखमां श्रीस्वामी,
१. ब्रिटिशरो, पोताना शासन दरम्यान, भारतमांथी केटली सांस्कृतिक सामग्री उठावी गया; २. ब्रिटिश लायब्रेरीनुं लंडनस्थित मकान भारतना खर्चे बंधायेल छे; ३. ए सम्पत्ति पाछी मेळववा माटेना प्रयत्न करवामां भारत अने पाकिस्ताननी सरकारो ऊणी ऊतरी छे, अने हवे ते ब्रिटिश सरकारनी ज सम्पत्ति बनी गई छे;
आ बधी विगतो आपी छे. परंतु तेमनो प्रधान सूर तो ते बधुं त्यां होवाथी ज सुरक्षित छे- वो ज जणाय छे. सवाल एटलो ज उद्भवे के भारतनी ए सम्पत्ति ब्रिटिशरो कोई पण रीते उठावी गया ते शुं एक राष्ट्रनी अने एक संस्कृतिनी
मना द्वारा थयेली हानि नथी ? खरेखर तो कोई चोरी जाय अने तोडी फाडी नाखे ए बन्नेनी मानसिकतामां, थोडां वर्षोनो तफावत बाद करतां, कोई ज अंतर न गणावुं जोईए.
भारतीयोनी अंग्रेज - पूजा विषे संस्कृतना सुख्यात विद्वान् श्रीचमूकृष्ण शास्त्रीए (दिल्ली ) पोताना एक संस्कृत लेखमां एक प्रसंग आ प्रमाणे नोंध्यो छे : "सन् १९९७मां बेंगलोरमां विश्व संस्कृत सम्मेलन हतुं. तेमां उपस्थित २००० जेटला प्रतिनिधिओमां सो जेटला विदेशीओ हता. सम्मेलन पछी एक वृद्ध पुरुषे मने कह्युं : 'केवुं दुर्भाग्य छे ! संस्कृतज्ञोनी आ केवी मानसिक गुलामी छे? सम्मेलनमां घणा भारतीय विदेशीओने वींटळाईने रह्या हता अथवा तो तेमनी पाछळ पाछळ दोडता रह्या ! विदेशीओनी ज 'तमे ज अमारां मा - बाप' एवी स्तुति करता अने ओ ज सर्वज्ञ छे एवी मानसिकता धरावता आपणा भारतीयो हवे जागे तो सारुं."
पोताना उपरोक्त लेखमां श्रीचमूकृष्ण शास्त्रीए एक महत्त्वपूर्ण वात करी छे
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