________________
त्रू.
81
जिनवाणी अमृत लवा ॥ २२ ॥
पंचसयासिउं संयम लेवइ । जिनपति ततक्षण त्रिपदी देवइ ।
चउदपूरव गणधर कहिइ ।
घडीमांहिं [ पूर्व ] ते कीधां । मुनिवरनइ पणि भणवा दीधां । वद्यावंत विचार लहिइ || २३ ||
वस्तु समोसरणिं समोसरणिं मलइ बहु देव ।
अमरख आणी आवीइ इंद्रभूति जिनवर बोलावइ । अनुकरमिं गणधर सवे जिन समीविं संयम पावइ । त्रिपदी तीर्थंकर कहइ विरचइ पूरव सार । जिन पासई वासि वसइ वरतिउ जयजयकार ॥ २४ ॥
ढाल ३
(दशानभद्रना रासनुं पहिलं ढाल ।
वीर जिनेशर पर नमीए० ए ढाल || )
वीर जिनेशर पय नमइए । गणधर गणधर वर अग्यार के । महियलि हीडइ परवर्या ए। बूझवर बूझवर वरण अढार के । वीर जिनेशर पय नमइए ।। २५ ।।
त्रूटक पय नमइ मुनिवर चऊद सहस सहस छत्रीस पुव्वता ( ? ) । सुर असुर नरवर चरण सेवइ वखाणंइ बहुसुं वृता । बहुतिरि वरस आयु पाली करम टाली सिद्धि थया । कात्तिक वदिनी अमावस्या पावाई शवपुरि गया ।। २६ ।। सोहम्म गणहर पांचमाइ वीरनइ वीरनई पाटि वखाणि के । जाणि जगगुरु गुणिनिलु ए ज्ञान ए ज्ञान ए तणी ए खाणि के । सोहंम गणधर पांचमा ए ||२७||
पांच गुणधर सुंदर सुखकर गुणमंदिर सुरतरु ग्रामानुग्रामिं व्याहर करता फरता देसदेसांतरु |
Jain Education International
For Private & Personal Use Only
www.jainelibrary.org