________________ जिन सूत्र भागः 2 धूल तुम्हारे दर्पण पर, हवा के एक झोंके में बिखर सकती है। ध्यान अभ्यास न रहा, सिद्धि हो गयी। जब तुम्हारे भीतर झोंका बलशाली चाहिए! निर्विचार रहना तुम्हारी सहज संपदा हो गयी-तुम जब चाहो ध्यान एक मशाल बने। दोनों छोरों से जले। तब आंख बंद करके निर्विचार हो गये। पहले तो बड़ा कठिन जर्मनी की एक बहुत विचारशील महिला रोज़ा लक्झेंबर्ग होगा। पहले तो उलटी हालत हो जाएगी। जब आंख बंद कहती थी कि मैंने एक ही बात जीवन में पायी कि अगर तुम करोगे, विचारों का हमला होगा। उससे भी ज्यादा-दुकान पर अपनी मशाल को दोनों तरफ से एक-साथ जलाओ, त्वरा से बैठकर जितना नहीं होता उतना मंदिर में होता है, कभी खयाल जीओ, सघनता से जीओ, तो परमात्मा दूर नहीं। हम ढीले-ढीले किया? दुकान पर बैठकर काम में लगे रहते हो, उलझे रहते हो जीते हैं, सुस्त-सुस्त जीते हैं-कुनकुने-कुनकुने-कभी वह विचारों का कोई खास हमला पता नहीं चलता है। लेकिन मंदिर घड़ी नहीं आती जहां हमारा जल वाष्पीभूत हो जाए। हम लंबा में जाकर बैठते हो कि चलो घडीभर शांति से बैठें, आंख बंद की जीना चाहते हैं, गहरा नहीं जीना चाहते। हम आशीर्वाद देते हैं कि न मालूम कहां-कहां के विचार खड़े हो जाते हैं। कि सौ साल जीओ। सौ साल जीने से क्या होगा! जैसे मुर्दे की संगत-असंगत; अच्छे-बुरे; सार्थक-व्यर्थ; जिनसे कुछ भी तरह जी रहे हो, ऐसे हजार साल भी जीओ तो कोई सार नहीं है। नहीं लेना-देना, वे सब सिर उठाने लगते हैं। क्या हो जाता है? यह आशीर्वाद भ्रांत है। यह आशीर्वाद शुभ नहीं है। सौ साल | मेरे पास लोग आते हैं, वे कहते हैं जब ध्यान करते हैं, तब जीने से क्या लेना! एक दिन भी जीओ, लेकिन जीओ! ऐसे सौ विचार और ज्यादा आते हैं। इससे तो बिना ध्यान में कम आते साल घसिटने से क्या होगा? हैं। बिना ध्यान में कम आते हैं, क्योंकि जब तुम बिना ध्यान में अब एक रात अगर कम जीये, तो कम ही सही हो, तब तुम्हारा मन कहीं संलग्न होता है, कहीं लगा होता है। तो यही बहुत है कि हम मशालें जला के जीये जिस तरफ तुम संलग्न हो, उसी सीमा से बंधे हुए विचार, उसी इससे क्या फर्क पड़ता है कि कितनी देर जीये! कितने गहरे दिशा से बंधे हुए विचार आते हैं। जब तुम ध्यान में बैठे जीये...! हो-असंलग्न, अव्यस्त–तो सभी दिशाओं से विचार आते ध्यान रखना, बाहर की तरफ जानेवाला व्यक्ति मात्रा और | हैं। तब तुम घबड़ा जाते हो। ध्यान लगता नहीं। शुरू-शुरू में परिमाण पर जोर देने लगता है-सौ साल जीये। भीतर यह स्वाभावकि है। बहुत-से विचार तुम्हारे भीतर पड़े हैं, जो जानेवाला व्यक्ति कहता है, जीओ चाहे एक क्षण, लेकिन ऐसी तुमने दबा रखे हैं, वह उभरेंगे। इसलिए पहले ध्यान में रेचन परिपूर्णता से जीओ, ऐसी समग्रता से जीओ कि उस एक क्षण में होगा। सब कूड़ा-कबाड़ उठेगा। जैसे वर्षों तक किसी ने घर को शाश्वतता समाविष्ट हो जाए। और एक क्षण में शाश्वत बुहारा न हो, फिर एक दिन घर में आये तो धूल उठने लगे। धूल समाविष्ट हो जाता है। एक छोटा-सा क्षण अनंत काल बन की पर्ते की पर्ते जमी हैं। हां, बाहर बैठे रहो, पोर्च में, तो भीतर सकता है। सवाल गहराई का है। लंबाई का नहीं। सब शांति है, कोई धूल नहीं उठती। भीतर जाओ, तो धूल उठती ऐसा समझो कि एक आदमी पानी में तैर रहा है। ऐसा तैरता है। ऐसे ही जन्मों-जन्मों तक हमने विचार की धूल को जमने चला जाता है एक किनारे से दूसरे किनारे, यह एक ढंग है। यह दिया है-भीतर गये नहीं, बुहारी लगायी नहीं। भीतर कभी वर्षा हम सबका ढंग है। सतह पर तैरने का। और एक आदमी डुबकी होने न दी, स्नान होने न दिया, अब जब भीतर जाएंगे तो लगाता है, पानी में गहरे जाता है। गहराई में जाना ध्यान है, सतह जन्मों-जन्मों का कचरा उठेगा। पर तैरते रहना संसार है। सतह पर तैरनेवाले राजनीति में हैं। इसकी सफाई करनी होगी। और जब कोई सफाई करता है, तो गहरे जानेवाले धर्म में। धूल बड़े जोर से उठती है। ऐसे ही ध्यान में विचार बड़े जोर से 'पानी का योग पाकर नमक जैसे विलीन हो जाता है, ऐसे ही उठते हैं। लेकिन यह तो संक्रमण की बात है। सफाई हो जाएगी, निर्विकल्प समाधि में...।' विचार चले जाएंगे। निर्विकल्प समाधि का अर्थ है, जब ध्यान सध गया। जब | अगर कोई व्यक्ति शांतिपूर्वक प्रयोग करता जाए, तो 292 Jain Education International 2010_03 For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org