________________ 2 / हला प्रश्न: है-बाहर भी वही, भीतर भी वही। शाम शाम कूकदी नूं जिंदगी दी शाम होई। | जिसे तुम रट रहे हो, वह तो परमात्मा है ही: जो रट रहा है, वह आया नहीं शाम मेरा, ओसनं मिलायो जी।। भी परमात्मा है। तो रटन में ज्यादा मत उलझ जाना। पुनरुक्ति 'श्याम-श्याम रटते जीवन की सांझ हो गयी है, अभी तक कहीं मन को बहुत ज्यादा ग्रसित न कर ले! रटन पर बहुत ज्यादा मेरा श्याम नहीं आया। मुझे उसके दर्शन कराना।' भरोसा मत कर लेना। उपयोगी है. लेकिन कछ और भी आपकी शरण आयी हूं, स्वीकार करो! कहीं चूक न जाऊं! चाहिए। वह है बोध। वह है ध्यान। 'श्याम-श्याम रटते ही जीवन की सांझ हो गई। अभी तक परमात्मा को पाना मात्र रटन की बात नहीं है। रटने से ही होता मेरा श्याम नहीं आया।' होता तो बड़ा आसान होता। रट तो तोते भी लेते हैं। बोध नहीं, पहचान तुम्हारे पास नहीं, श्याम तो बहुत बार आया। चाहिए! अकेली रटन काम न देगी। रटन ठीक है, उपयोगी है, | श्याम तो आता ही रहा। श्याम तो आता ही रहता है। उसके बहुमूल्य है-लेकिन बोध से संयुक्त हो तभी; अन्यथा रटन सिवाय और कोई है ही नहीं जो आये। जो भी आया है उसमें यांत्रिक हो जाती है। कोई रटता रहता है श्याम-श्याम-श्याम, | श्याम ही आया है। कोई और तो आयेगा कैसे? सभी उसके लेकिन इस रटन के पीछे और हजार विचार चलते रहते हैं। यह | रूप हैं। सभी उसके ढंग हैं। सभी उसके रंग हैं। फूल में भी रटन धीरे-धीरे अभ्यास हो जाती है। इसे करने के लिए, रटने के वही। पत्तों में भी वही। पहाड़ों-पत्थरों में भी वही। लिए, किसी बोध की जरूरत ही नहीं रह जाती; यंत्रवत सरकती | पशु-पक्षियों में वही। स्त्री-पुरुषों में वही! जहां 'कुछ' है, वही रहती है। तुम न भी चाहो तो होती रहती है। और भीतर गहरे है; और जहां कुछ भी नहीं है, वहां भी वही है। इसलिए तलों पर हजार-हजार विचार चलते रहते हैं, हजार वासनाएं आने-जाने की भाषा तो हमारे मन की भाषा है। चलती रहती हैं। जब तक वे भीतर के तल पर विचार और परमात्मा है : न आता न जाता। जो 'है' उसका ही नाम वासनाएं खो न जायें, जब तक रटन अकेली न रह जाये, श्याम परमात्मा है—जो सदा है, जिसमें कोई गति नहीं है, जिसमें कोई के लिए पुकार उठे तो बस पुकार हो, भीतर कुछ और न प्रक्रिया-क्रिया नहीं है, जो 'मात्र होना' है! इस क्षण भी तुम्हें हो-तब तो पुकारने की भी जरूरत न पड़ेगी, बिन पुकारे उसी ने घेरा है। तुम राह किसकी देखते हो? कहीं राह देखने में परमात्मा पास आ जाता है। ही तो नहीं चूक रहे हो? क्योंकि जब आंखें किसी की राह देखती परमात्मा कभी दूर गया नहीं। जो दूर चला जाये वह परमात्मा हैं, तो और सब चूक जाता है। तुम अगर अपनी प्रेयसी की राह नहीं। वह सदा तुम्हारे पास है। सब तरफ से उसने ही तुम्हें घेरा देख रहे हो द्वार पर बैठकर, तो फिर और कोई नहीं दिखायी Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org