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________________ शरीर आदि चौदह मार्गणास्थानों के द्वारा तिर्यंचसृष्टि का सूक्ष्मतम वर्णन सब भारतीय दर्शनों में सिर्फ जैन मूलग्रन्थों में ही पाया जाता है ।१६ तिर्यंचों के आध्यात्मिक प्रगति के बारे में याने कि कुछ तिर्यंचों के चतुर्थ-पंचम गुणस्थान तक आत्मिक विकास का जिक्र भी जैन ग्रन्थों ने किया है ।१७ मुख्य बात यह है कि विविध प्रकार के तिर्यंचों में विविध प्रकार की इन्द्रियशक्तियाँ प्रखर रूप में मनुष्य से ज्यादा प्रखर होती है । उनका स्पष्टीकरण जैन ग्रन्थों में दिखायी नहीं देता । संज्ञी पंचेन्द्रिय तिर्यंचों के श्रुतज्ञान का और अवधिज्ञान का जिक्र भी अत्यन्त अल्प मात्रा में पाया जाता है। सारांश रूप से हम कह सकते हैं कि चार गतियों में से देव-नारक और तिर्यंचों का विचार सिर्फ अवधिज्ञान के सन्दर्भ में ही पाया जाता है । उनके मति-श्रुत की चर्चा नहीं है और मन:पर्याय एवं केवलज्ञान उनके दायरे के बाहर ही है । परिणामवश पूरी ज्ञानचर्चा में मुख्यत: 'मनुष्यलक्ष्यी' चर्चा ही आभासित होती है। ___* जातिस्मरण और अवधिज्ञान दोनों के विषय, अधिकारी आदि के बारे में जब हम सोचते हैं तब ऐसा प्रतीत होता है कि सामान्यत: जातिस्मरण खुद के विषय में होता है और अवधिज्ञान प्राय: दूसरे के बारे में होता है । ऐसी अवस्था में 'जातिस्मरण' की संकल्पना अवधिज्ञान की शायद प्राथमिक अवस्था है, ऐसा सूचित होता * आधुनिक परिप्रेक्ष्य में ‘अवधिज्ञान' का नूतन अर्थ : अवधिज्ञान का मर्यादित क्षेत्र में रूपी पदार्थों का ज्ञान कराता है । वर्तमान युग विज्ञान का अर्थात् scientific progress का युग है । निकटवर्ती क्षेत्रों के वस्तुओं का सूक्ष्मदर्शक यन्त्रों के द्वारा विस्तृत ज्ञान हो रहा है । सुदूरवर्ती वस्तु, व्यक्ति, घटना देखने के लिए सैकडों गॅजेट्स उपलब्ध हैं । दुर्बिण, गुगल, सीसीटीव्ही, कॅमेरा आदि उपकरणों के द्वारा विश्व के कई रूपी पदार्थों का ज्ञान प्रत्यक्ष रूप' में आ रहा है । चन्द्र-मंगल आदि उपग्रहों की फोटोग्राफी भी हो रही है । वैज्ञानिक खोजों के आधार से कई उपकरण विकसित किये गये हैं । आध्यात्मिक निकषों के अनुसार व्यक्ति चारित्रविशुद्धि के द्वारा अवधिज्ञान प्राप्त तो कर सकता है लेकिन दूसरों के लिए ये द्वार खोल नहीं सकता । संशोधकों ने विज्ञान के द्वारा ऐसे उपकरण खोजें हैं कि 'उपयोग' लगाने पर याने कि ‘बटन' दबाने पर किसी को भी अतिनिकटवर्ती अथवा अतिदूरवर्ती वस्तुओं का ज्ञान, समान रूप से होता है । इस अवधिज्ञान के लिए चारित्रपालन-ध्यान आदि की आवश्यकता नहीं है । हर-एक परमाणु में अनन्त शक्ति की संकल्पना जैन दर्शन ने की है । परमाणु विज्ञान ने atomic energy संकल्पना प्रत्यक्ष में लायी है । यह भी अवधिज्ञान का विस्तारित रूप ही कहा जा सकता है । वैज्ञानिक खोजों का अगर मानवी कल्याण के लिए उपयोग किया तो हम उसे 'सुअवधि' कह सकते हैं । अगर विनाशक कार्यों के लिए इस्तेमाल किया तो हम उसे 'कुअवधि' कह सकते हैं। कितने भी वैज्ञानिक उपकरणों से वस्तुओं का ज्ञान हो लेकिन जो भी ज्ञान होगा वह सब जैन दर्शन के अनुसार, वर्ण-गन्ध-रस और शब्दवाले पुद्गलों का ही होगा । उपकरणों द्वारा जाने गये समनस्क जीवों के अन्तरंगभाव तो विज्ञान के दायरे के परे ही रहेंगे । जैन दर्शन द्वारा कथित चारित्रविशुद्धि और अवधिज्ञान का सम्बन्ध हम आधुनिक परिप्रेक्ष्य में भी सोच सकते हैं । जब संशोधक विशिष्ट क्षेत्र में कार्यरत होता है तब वह एकाग्र ध्यास से सम्पन्न होता है । मोह और कषाय की दृष्टि से भी अनेक उपभोग्य वस्तुओं से निवृत्त और निरासक्त रहता है । इस अवस्था को हम 'ध्यान' भी कह सकते हैं । जैन अवधारणा के अनुसार इस पंचम आरे में अवधिज्ञान की संभावना है। विविध वैज्ञानिक खोजों ने सिद्ध किया है कि एक दृष्टिकोण से अवधिज्ञान का क्षेत्र बढ़ भी रहा है और जनसाधारण के लिए खुला भी हो रहा है । दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि आध्यात्मिक क्षेत्र से बाहर आकर यह ज्ञान वास्तववादी प्रत्यक्ष क्षेत्र में प्रवेश कर रहा है।
SR No.229740
Book TitleTattvartha Sutra me Nihit Gyan Charcha Ek Nirikshan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKaumudi Baldota
PublisherKaumudi Baldota
Publication Year2013
Total Pages14
LanguageHindi
ClassificationArticle, 0_not_categorized, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size145 KB
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