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________________ नहीं है किन्तु सं. 1952, 1961, 1989 की तरह सकल श्री संघ द्वारा आचरित धोरी मार्ग पर चलने में ही संघ की एकता होगी और वही उचित लगता है। तुमने तुम्हारी "जैन पर्वतिथि का इतिहास" नामक पुस्तिका के पृष्ठ 44 पर लिखा है कि सं. 1961 में श्री सागरजी महाराज ने भी कपडवंज में संघ की एकता के लिये संघ को अन्य पंचांग मान्य रखाया था तो इस वक्त भी सं. 1961 में कपडवंज की तरह अन्य पंचांग को मान्य करके छठ्ठ का क्षय करके सकल श्री संघ के साथ भा.शु.-4, मंगळवार को श्री संवत्सरी करना ही हमें उचित लगता है। और तो ही संघ की एकता की सच्ची भावना कही जायगी । आपको भी ऐसी ही प्रेरणा करना ही उचित है । श्रीकल्पसूत्र, श्रीनिशीथसूत्र, चूर्णि तथा युगप्रधान श्रीकालिकाचार्य भगवान की आचरणा आदि अनेक प्रमाण-साबिती के आधार पर तथा त्रिकालाबाधित जैन शास्त्रानुसारी तपागच्छीय श्रीविजयदेवसूरीय पंरपरा अनसार तथा श्रीधर शीवलाल जोधपुरी चंडाशुचंडु पंचाग के आधार पर, और 1952, 1961, 1989 में अहमदाबाद के डहेळा के उपाश्रय, लवार की पोळ के उपाश्रय, वीर के उपाश्रय, विमळ के उपाश्रय आदि सर्व उपाश्रयवाले और हिन्दुस्तान के सकल श्री तपागच्छीय संघ के सभी आचार्य, साधु-साध्वी, श्रावक-श्राविका चतुर्विध संघ द्वारा आचरित आचरणा के अनुसार इस वर्ष सं. 2004 की साल में भी संवत्सरी महापर्व भाद्रपद शुक्ल-4, मंगळवार, ता. 7-9-1948 को ही आराधना करनी हमें उचित लगता है । आपको भी इस प्रकार संवत्सरी पर्व की आराधना करनी चाहिये और ऐसा हमें उचित व हितकर लगता है । बाकी जैसी आपकी इच्छा । सं. 1952 की श्रीसंघ की आचरणा सेआज तक कोई गरबडी पैदा नहीं यी है, वैसे भविष्य में भी गरबडी होगी ऐसा हम मानते ही नहीं है। मुनि श्री दर्शनविजयजी का स्वास्थ्य अब सुचारु होगा । वि. सं. 1998 में शेठ श्रीकस्तुरभाई ने श्रीसुरचंद पुरुषोत्तमदास बदामी जज साहिब, शेठ भगुभाई चुनीलाल स्तरीया, शेठ चमनभाई लालभाई, शेठ जीवतलाल प्रतापशी, शेठ पोपटलाल धारशीभाई इन पांचो गृहस्थ को अहमदाबाद से तिथि के शास्त्रार्थ के बार में निम्नोक्त ड्राफ्ट लेकर तळाजा नगरे परम पूज्य शासनसमाट गुरु भगवंत श्रीनेमिसूरीश्वरजी महाराज के पास भेजे थे ।इस ड्राफ्ट में आ. श्रीसागरानंदसूरीश्वरजी म. और आ. श्रीरामचंद्रसूरीश्वरजी म. के हस्ताक्षर थे ।और इसके बारे में सूचन व संमति लेने के लिये आये थे । उन्हों ने संमति व सूचन देने को कहा, उसके प्रत्युत्तर में हमने बताया कि जाहिर व मौखिक पद्धति से आ. श्रीरामचंद्रसूरिजी के साथ शास्त्रार्य करना हो तो इसमें अपनी संमति है । बदामी साहब ने कहा साहिब इस ड्राफ्ट में जाहिर व मौखिक शास्त्रार्थ की ही बात है । यह सुनकर हमने वही ड्राफ्ट मांगा, उन्हों ने दिया और हमने पढा । वही ड्राफ्ट निम्नोक्त प्रकार का था ---- पालिताणा, ता. 19-4-1942, वैशाख शुद-4, रविवार श्री सकळ संघ की तिथि चर्चा संबंधित मतभेद की शान्ति के लिये निर्णय करने के लिये शेठ कस्तूरभाई लालभाई जिन तीन आदमी के नाम का प्रस्ताव लाये उनमें से हम दोनों को (आचार्य श्रीसागरानंदसूरि तथा आ. श्रीरामचंद्रसूरिजी को) दो दो नाम पसंद करना । उसमें जो नाम पर दोनो की संमति हो उसको न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करके, वह दोनों पक्ष के मंतव्य सुनकर जो निर्णय दे वह हम दोनों को कबूल करना और इनके अनुसार आचरण करने का हम दोनों और दोनों के शिष्य समुदाय को मंजूर होगा । विजयरामचंद्रसूरि दा. पोते. आनंदसागर दा. पोते. इस ड्राफ्ट को पढकर हमने कहा कि इसमें हस्ताक्षर करनेवाले दोनों आचार्य अपना मंतव्य बिना जाहिर व मौखिक शास्त्रार्थ न्यायाधीश को समझा सकते हैं । इसमें जाहिर व मौखिक शास्त्रार्थ शब्द है ही नहीं । सं 1998 में तळाजा आये श्रीबदामी साहिब आदि और सं. 1999 मैं बोटाद आये शेठ श्रीकस्तुरभाई ने दिया हुयाप्रारूप अर्थात् ड्राफ्ट---
SR No.212428
Book TitleTapagachhiya Tithi Pranalika Ek Tithi Paksh
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVijaynandansuri
PublisherVijaynandansuri
Publication Year2019
Total Pages17
LanguageHindi
ClassificationArticle & 0_not_categorized
File Size66 KB
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