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________________ श्राचार्य विजयवल्लभसूरि स्मारक ग्रंथ बृहत्कल्पसूत्र के कर्ता है प्राचीन गोत्रीय या प्राचीन जनपद के स्थविर आर्य भद्रबाहु। अपने बनाये हुए इस छेदसूत्र के चतुर्थ उद्देश में साधुओं के जलयान की चर्चा करते हुए श्राप लिखतें हैं-"नो कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा इमाअो पंचमहराणवाश्रो महानदीअो उद्दिवाश्रो गणियाश्रो वंजियारो अंतो मासा दुक्खुत्तो वा तिक्खुत्तो वा उत्तरित्तर वा संतरित्तए वा। तं जहा-गंगा, जउणा, सरउ, कोसिया मही।" इस सूत्र के ऊपर नियुक्ति भी देखनी चाहिये पंचएहं गहणेणं सेसा विउ सूइया महासलिला। तत्थ पुरा विहरिंसु य, ण य तातो कयाइ सुक्खंति ॥ ५६२० ॥ फिर आगे इसी विषय की विस्तृत चर्चा पाती है। नावसन्तरण के भिन्न भिन्न दोष दिखलाते हुए बृहत्कल्पसूत्र के (नियुक्तिकार या) भाष्यकार कहते हैं वीरवरस्स भगवतो, नावारूढस्य कासि उवसगं। मिच्छद्दिहि परद्धो, कंबल-संबलेहिं तारिश्रो भगवं ॥ ५६२८ ॥३८ भगवान् महावीर भी नाव में चढ़े थे इस की प्रतीति अावश्यक-नियुक्ति गाथा ४६६-७१३. से भी होती है। उपर्युक्त भाष्यगाथात्रों में प्रत्यनीकादि दोषों की चर्चा और इनसे बचने के लिए जहाँ तक हो सके, स्थल-रास्ता (खुश्की-रास्ता) ग्रहण करने के उपदेश के साथ ही नाव से या चलते ही नदी पार करने की चर्चा है। जहाँ जल की गहराई बिलकुल कम हो और जानू से भी नीचे जल हो, मतलब कि जहाँ पाँव को जल से ऊपर ऊठा कर फिर आगे रख कर नदी में चल सकें वहाँ कीचड़ से बच सकते हैं और गिरने की या जीवहिंसा की सम्भावना अतीव कम हो जाती है। किन्तु इस सारी चर्चा में नावारोहण-नाव से नदी पार करने का सम्पूर्ण प्रतिबन्ध नहीं रक्खा गया। कालकाचार्य और सागर-श्रमण समुद्रमार्ग से-जहाजी रास्ते से नहीं किन्तु खुश्की रास्ते से गये होंगे ऐसा हमारा खयाल है। और बृहत्कल्पभाष्य की चूर्णि और टीका के वृत्तान्तों का ध्वनि यही है। रास्ते में कालक के शिष्यों को लोग पूछते हैं, "ये कौन से प्राचार्य जा रहे हैं ?” इसका मतलब यही है कि वे खुश्की रास्ते से गये। ईसा के पूर्व की शताब्दियों में खुश्की रास्ता ज्यादा इस्तेमाल होता था। जहाजी व्यापार क्रमशः बढ़ा होगा। खुश्की रास्ते थे जो चीन ( दक्षिण चीन) तक ले जाते थे। खुश्की रास्ते के विषय में डा० मजुमदार लिखते हैं "From early times there was a regular trade-route by land between Eastern India and China through Upper Burma and Yunnan. We know from Chinese Chronicles that in the second century B.C. merchants with their ware travelled from China across the whole of North India and Afghanistan to Bactria. Through this route came early Chinese priests for whom, according to I-tsing, an Indian king built a temple in the third or fourth century A.D. From different points along this route one could pass to Lower Burma and other parts of Indo China, and a Chinese writer whom, according to From different Pindo China, and a ३७. बृहत्कल्पसूत्र, उद्देश ४, सू० ३२, विभाग ५, पृ० १४८७, गाथा ५६२०. ३८. वही, पृ० १४८६, गाथा, ५६२८. ३६. आवश्यक-सूत्र, हारिभद्रीय वृत्ति, पत्र १६०-१. Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.212213
Book TitleSuvarnabhumi me Kalakacharya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorUmakant P Shah
PublisherZ_Vijay_Vallabh_suri_Smarak_Granth_012060.pdf
Publication Year1956
Total Pages50
LanguageHindi
ClassificationArticle & Ascetics
File Size3 MB
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