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________________ Gil शोध, हिसादि विकारों से सुरक्षित हो जाता है। निश्चित ही जन संस्कृति एक महान संस्कृति दूसरे पक्ष को भी जब कोई प्रतिक्रिया नहीं मिलती, है और उसकी उपलब्धियाँ मानव समाज को श्रेष्ठ तो उसकी दुष्प्रवृत्तियाँ दुर्बल हो जाती हैं, उसके स्वरूप प्रदान करने में कम नहीं हैं। मानवाकृति मन में प्रायश्चित्त का भाव उदित होता है, उसका का देह धारण करने वाले प्राणी को सच्ची मनुसंशोधन आरम्भ हो जाता है। क्षमाशीलता का ष्यता के सद्गुणों से मनुष्य बना देने की भूमिका ऐसा अद्भुत प्रभाव है और इस प्रभाव का उपयोग में श्रमण संस्कृति को अनुपम सफलता मिली है / करते हुए श्रमण संस्कृति मानव मात्र को मैत्री, श्रमण संस्कृति भी अन्य संस्कृतियों की ही भाँति / बन्धुत्व, साहचर्य और सहानुभूति की उदात्तता से विकासमान रही है। युगीन परिस्थितियों के अनुविभूषित करती है। रूप इसमें परिवर्तन होते ही रहे हैं और आगे भी ___'जीओ और जीने दो'--मनुष्य के लिए एक होते रहेंगे। इन परिवर्तनों के प्रभाव दो रूपों में सुन्दर आदर्श है, किन्तु जैन सांस्कृतिक दृष्टि इसमें प्रकट हो सकते हैं। एक तो यह कि संस्कृति के . किसी असाधारणता को नहीं देखती। 'जीने दो'- विद्यमान स्वरूप में कुछ नवीन शुभ पार्श्व जुड़ते का भाव यही है कि उसके जीने में किसी प्रकार रहें और उसकी गरिमा बढ़ती रहे / इस प्रकार तो। का व्यवधान प्रस्तुत न करो। यह निषेधमलक किसी भी संस्कृति की क्षमता और मूल्य में अभिनिर्देश भी प्रशसनीय अवश्य है, किन्तु यह अपूर्ण वृद्धि ही होती है। किन्तु परिवर्तन का जो दूसरा भी है। केवल बाधा न डालने मात्र से ही दूसरों के रूप संभावित है, उसके प्रति भी हमें सावधान 4 जीने में हम सहायक नहीं हो सकते। हमारा कर्तव्य रहना चाहिये। समय स्वयं सभी वस्तुओं और तो यह भी है कि दूसरों के जीवन को हम सगम विचारो को परिवर्तित करता रहता है। उच्च-भव्य बना दें, दूसरों को जीने के लिए हम सहायता भी प्रासाद समय द्वारा ही खण्डहर कर दिये जाते हैं। करें / मनुष्य के समुदाय में रहने की इतनी उपादे- समय जहाँ कच्चे फलों को पकाकर सरस और यता तो होनी ही चाहिये / जनसेवा और मानव- सुस्वातु बना देता है, वहाँ यही समय उन फलों को मैत्री के इन पुनीत आदर्शों के कारण जैन संस्कृति दूषित और विकृत भी कर देता है। फल सड़-गल४ के गौरव में अभिवद्धि हुई है। भगवान महावीर का जाते हैं। समय व्यतीत होते रहने के साथ ही यह सन्देश भी इस सन्दर्भ में उल्लेखनीय है कि कलियाँ खिलकर शुरम्य पुष्प हो जाती हैं और यह H मेरी सेवा करने की अपेक्षा दीन-दुखियों की सेवा समय पुष्पों को रूपहीन और अनाकर्षक भी बना # || करना अधिक श्रेयस्कर है। मेरी भक्ति करने देता है। समय ने हो श्रमण संस्कृति को इतना वालों पर, माला फेरने वालों पर मैं प्रसन्न नहीं उदात्त और इतना महान स्वरूप प्रदान किया है। हूँ। मैं तो प्रसन्न उन लोगों पर हैं, जो मेरे आदेश अब हमारे सामने एक गुरुतर दायित्व है / हमें का पालन करते हैं / और मेरा आदेश यह है कि प्रयत्नपूर्वक इस संस्कृति की श्रीवृद्धि करनी होगी ! प्राणिमात्र को साता समाधि पहँचाओ। () (C) 20 566 कुसुम अभिनन्दन ग्रन्थ : परिशिष्ट 60 साध्वीरत्न कुसुमवती अभिनन्दन ग्रन्थ Jain Education International PORNatoopersonalitice-Only www.jainelibrary.org
SR No.212197
Book TitleSarthak hai Siddharshi ka Rachna Upkram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGarimashreeji
PublisherZ_Kusumvati_Sadhvi_Abhinandan_Granth_012032.pdf
Publication Year1990
Total Pages6
LanguageHindi
ClassificationArticle & Literature
File Size910 KB
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