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________________ ६६. एवमेगे 3 पासत्या पनवंति अणारिया । इत्थीवसंगया बाला, जिणसासणपरम्मुहा || जहा गंडं पिलागं वा, पिरपीलेज्ज मुहुत्तंगं । एवं विन्नवणित्थीसु, दोसो तत्थ कओ सिया || - सूत्रकृतांग, १/३/४/९-१० , ६७. उपासकदशा, १,४८ । ६८. अणंगसेणा पामोक्खाणं अणेगाणं गणियासाहस्सीणं ...... आवश्यकचूर्णि भाग १, पृ० ३५६ | ६९. आदिपुराण, पृ० १२५, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, १९१९ । ७०. अड्डा जाव .........सामित्तं भट्टित्तं महत्तरगतं आणा ईसर सेणावच्चं कारेमाणी ७१. देखें, जैन, बौद्ध और गीता का आचार दर्शन, भाग २, डा० सागरमल जैन, पृ० २६८ । ७२........असईजणपोसणया । उपासकदशा, १ / ५१ 'सती' शब्द का अर्थ 'सती' की अवधारणा जैनधर्म और हिन्दूधर्म दोनों में ही पाई जाती है । दोनों में सती शब्द का प्रयोग चरित्रवान स्त्री के लिए होता है' श्वेताम्बर स्थानकवासी जैन परम्परा में तो आज भी साध्वी श्रमणी 1 को सती या महासती कहा जाता है। यद्यपि प्रारम्भ में हिन्दू परम्परा में 'सती' का तात्पर्य एक चरित्रवान या शीलवान स्त्री ही था किन्तु आगे चलकर हिन्दू परम्परा में जबसे सती प्रथा का विकास हुआ, तब से यह 'सती' शब्द एक विशिष्ट अर्थ में प्रयुक्त होने लगा। सामान्यतया हिन्दूधर्म में 'सती' शब्द का प्रयोग उस स्त्री के लिए होता है जो अपने पति की चिता में स्वयं को जला देती है। अतः हमें यह स्पष्ट रूप से समझ लेना होगा कि जैनधर्म को 'सती' की अवधारणा हिन्दू परम्परा की सतीप्रथा से पूर्णतः भिन्न है। यद्यपि जैनधर्म में 'सती' एवं 'सतीत्व' को पूर्ण सम्मान प्राप्त है किन्तु उसमें सतीप्रथा का समर्थन नहीं है । जैनधर्म में प्रसिद्ध सोलह सतियों के कथानक उपलब्ध हैं और जैनधर्मानुयायी तीर्थकरों के नाम स्मरण के साथ इनका भी प्रातः काल नाम स्मरण करते हैं - Jain Education International ब्राह्मी चन्दनवालिका भगवती राजीमती द्रौपदी । कौशल्या च मृगावती च सुलसा सीता सुभद्रा शिवा ।। कुन्ती शीलवती नलस्यदयिता चूला प्रभावत्यपि । पद्मावत्यपि सुन्दरी प्रतिदिनं कुर्वन्तु नो मंगलम् ।। इन सतियों के उल्लेख एवं जीवनवृत्त जैनागमों एवं आगमिक व्याख्या साहित्य तथा प्राचीन जैनकाव्यों एवं पुराणों में मिलते हैं । किन्तु उनके जीवनवृत्तों से ज्ञात होता है कि उनमें से एक भी ऐसी नहीं है ७३. साविका जाया अबंभस्स पच्चक्खड णण्णत्य रायाभियोगेण । आवश्यकचूर्णि भाग १, पृ० ५५४-५५ । जैनशिलालेख संग्रह, भाग २ अभिलेख क्रमांक ८ । सती प्रथा और जैनधर्म - , ७५. जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति - शान्तिसूरीय वृत्ति अधिकार२, ३० । ७६. ज्ञाताधर्मकथा, ४/६ । ७७. तम्हा उ वज्जए इत्थी ......आघाते ण सेवि णिग्गंथे । सूत्रकृतांग १, ४, १,११ ७८. कप्पइ निग्गंचीणं विइकिए काले सज्झायं करेत्तए निर्णय निस्साए । (तथा) पंचवासपरियाए समणे निग्गंथे, सट्ठिवास परियाए समणीए निग्गंथीए कप्पइ आयरिय उवज्झायत्ताए उद्दिसित्ताए । " " व्यवहारसूत्र ७, १५, व २० । ७९. इस समस्त चर्चा के लिए देखें मेरे निर्देशन में रचित और मेरे द्वारा सम्पादित अन्य जैन और बौद्ध भिक्षुणी संप- डॉ अरुण प्रताप सिंह । - For Private & Personal Use Only जिसने पति की मृत्यु पर उसके साथ चिता में जलकर उसका अनुगमन किया हो, अपितु ये उन वीरांगनाओं के चरित्र हैं जिन्होंने अपने शील रक्षा हेतु कठोर संघर्ष किया और या तो साध्वी जीवन स्वीकार कर भिक्षुणी संघ में प्रविष्ट हो गईं या फिर शीलरक्षा हेतु मृत्युवरण कर लिया । आगमिक व्याख्या साहित्य में दधिवाहन की पत्नी एवं चन्दना की माता धारिणी आदि कुछ ऐसी स्त्रियों के उल्लेख हैं जिन्होंने अपने सतीत्व अर्थात् शील की रक्षा के लिए देहोत्सर्ग कर दिया। अत: जैनधर्म में सती स्त्री वह नहीं जो पति की मृत्यु पर उसकी चिता में जलकर उसका अनुगमन करती है अपितु वह है जो कठिन परिस्थितियों में अपनी शीलरक्षा का प्रयत्न करती है और अपने शील को खण्डित नहीं होने देती है, चाहे इस हेतु उसे देहोत्सर्ग ही क्यों न करना पड़े । सती प्रथा के औचित्य और अनौचित्य का प्रश्न सतीप्रथा के औचित्य और अनौचित्य का प्रश्न एक बहुचर्चित और ज्वलन्त प्रश्न के रूप में आज भी उपस्थित है। निश्चित ही यह प्रथा पुरुष प्रधान संस्कृति का एक अभिशप्त परिणाम है। यद्यपि इतिहास के कुछ विद्वान इस प्रथा के प्रचलन का कारण मुस्लिमों के आक्रमणों के फलस्वरूप नारी में उत्पन्न असुरक्षा की भावना एवं उसके शील भंग हेतु बलात्कार की प्रवृत्ति को मानते हैं, किन्तु मेरी दृष्टि में इस प्रथा के बीज और प्रकारान्तर से उसकी उपस्थिति के प्रमाण हमें अति प्राचीनकाल से ही मिलते हैं । सती प्रथा के मुख्यतः दो रूप माने जा सकते हैं, प्रथम रूप जो इस प्रथा का वीभत्स रूप है; इसमें नारी को उसकी इच्छा के विपरीत पति के शव के साथ मृत्युवरण को विवश किया जाता है । दूसरा रूप वह है जिसमें पति की मृत्यु पर भावुकतावश स्त्री स्वेच्छा से www.jainelibrary.org.
SR No.212117
Book TitleSatipratha aur Jain Dharm
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSagarmal Jain
PublisherZ_Shwetambar_Sthanakvasi_Jain_Sabha_Hirak_Jayanti_Granth_012052.pdf
Publication Year1998
Total Pages2
LanguageHindi
ClassificationArticle & Society
File Size575 KB
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