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________________ - यतीन्द्रसूरि स्मारक ग्रन्थ - इतिहास१३३६) और उपकेशगच्छ की कुछ पट्टावलियाँ उपलब्ध हैं। श्रावक किसी अन्य बड़े गच्छ में सम्मिलित हो गए होंगे। इस गच्छ के मुनिजनों द्वारा प्रतिष्ठापित बड़ी संख्या में कृष्णर्षिगच्छ प्राक्मध्ययुगीन और मध्ययुगीन श्वेताम्बर जिनप्रतिमाएँ प्राप्त होती है, जिनमें से अधिकांश लेखयुक्त हैं। आम्नाय के गच्छों में कृष्णर्षिगच्छ भी एक है। आचार्य वटेश्वर इसके अतिरिक्त इस गच्छ के मुनिजनों की प्रेरणा से निर्मित क्षमाश्रमण के प्रशिष्य और यक्षमहत्तर के शिष्य कृष्णमुनि की सर्वतोभद्रयंत्र, पंचकल्याणकपट्ट, तीर्थंकरों के गणधरों की शिष्य-संतति अपने गुरु के नाम पर कृष्णर्षिगच्छीय कहलायी। चरणपादुका आदि पर भी लेख उत्कीर्ण हैं। ये सब लेख वि.सं. धर्मोपदेशमाला-विवरण (रचनाकाल वि.सं. ९१५/ई. सन् ८५९) १०११ से वि.सं. १९१८ तक के हैं। उपकेशगच्छ के इतिहास के के रचयिता जयसिंहसरि, प्रभावक-शिरोमणि प्रसन्नचंद्रसूरि, लेखन में उक्त साक्ष्यों का विशिष्ट महत्त्व है। निस्पृह-शिरोमणि महेन्द्रसूरि, कुमारपालचरित (वि.सं. १४२२/ उपकेशगच्छीय साक्ष्यों के अध्ययन से यह निष्कर्ष ई. सन् १३६८) के रचनाकार जयसिंहसूरि, हम्मीर महाकाव्य निकलता है कि वि.सं. की १०वीं शताब्दी से लेकर वि.सं. की (रचनाकाल नि.सं. १४४४/ई. सन् १३८६) और १६ वीं शताब्दी तक इस गच्छ के मुनिजनों का समाज पर विशेष रम्भामञ्चरीनाटिका के कर्ता नयचन्द्रसूरि इसी गच्छ के थे। इस प्रभाव रहा, किन्तु इसके पश्चात् इसमें न्यूनता आने लगी, फिर गच्छ में जयसिंहसूरि, प्रसन्नचन्द्रसूरि, नयचन्द्रसूरि इन तीन पट्टधर भी २०वीं शती के प्रारंभ तक निर्विवादरूप से इस गच्छ का आचार्यों के नामों की पुनरावृत्ति मिलती है, जिससे अनुमान स्वतंत्र अस्तित्व बना रहा।१५ होता है कि यह चैत्यवासी गच्छ था। इस गच्छ से संबद्ध पर्याप्त संख्या में अभिलेखीय साक्ष्य भी प्राप्त हए हैं जो वि.सं. १२८७ काशहद-गच्छ अर्बुदगिरी की तलहटी में स्थित काशहृद से वि.सं. १६१६ तक के हैं। (वर्तमान कासीन्द्रा या कायन्द्रा) नामक स्थान से इस गच्छ की उत्पत्ति मानी जाती है। जालिहरगच्छ के देवप्रभसूरि द्वारा रचित अभिलेखीय साक्ष्यों से इस गच्छ की कृष्णर्षितपाशाखा पद्मप्रभचरित (रचनाकाल वि.सं. १२५४/ई सन् ११९८) की . र का भी उल्लेख प्राप्त होता है। इस शाखा के वि.सं. १४५० से प्रशस्ति से जात होता है कि काशहद और जालिहर ये दोनों. १४७३ तक के लेखों में पुण्यप्रभसूरि, वि.सं. १४८३-१४८७ के विद्याधरगच्छ की शाखाएँ हैं।१६ यह गच्छ कब अस्तित्व में लेखों में शिष्य जयसिंहसूरि तथा वि.सं. १५०३-१५०८ के लेखों आया, इस गच्छ के आदिम आचार्य कौन थे, इस बारे में कोई में जयसिंहसूरि के प्रथम पट्टधर जयशेखरसूरि तथा वि.सं. १५१० सूचना प्राप्त नहीं होती। प्रश्नशतक और ज्योतिषचतुर्विंशतिका के एक लेख में उनके द्वितीय पट्टधर कमलचन्द्रसूरि का के रचनाकार नरचन्द्र उपाध्याय इसी गच्छ के थे। प्रश्रशतक का प्रतिमाप्रतिष्ठापक के रूप में उल्लेख प्राप्त होता है, किन्तु इस रचनाकाल वि.सं. १३२४/ई. सन १२६८ माना जाता है। शाखा के प्रवर्तक कौन थे. यह शाखा कब अस्तित्व में आई, विक्रमचरित (रचनाकाल वि.सं. १४७१/ई सन १४१५ के इस संबंध में कोई सूचना प्राप्त नहीं होती। आसपास) के रचनाकार उपाध्याय देवमूर्ति इसी गच्छ के थे।७ वि.सं. की १७वीं शती के पश्चात् कृष्णर्षिगच्छ से संबद्ध इस गच्छ से संबद्ध कुछ प्रतिमालेख भी प्राप्त होते हैं जो वि.सं. साक्ष्यों का अभाव है। इससे प्रतीत होता है कि इस समय तक १२२२ से वि.सं. १४१६ तक के हैं। इस गच्छ का अस्तित्व समाप्त हो चुका था। से उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर विक्रम संवत् की १३ वीं . कोरंटगच्छ९ आबू के निकट कोरटा (प्राचीन कोरंट) शती से १५ वीं शती के अन्त तक इस गच्छ का अस्तित्व सिद्ध नामक स्थान से इस गच्छ की उत्पत्ति मानी जाती है। उपकेशगच्छ होता है। इस गच्छ से संबद्ध साक्ष्यों की विरलता को देखते हुए की एक शाखा के रूप में इस गच्छ की मान्यता है। इस गच्छ के यह माना जा सकता है कि अन्य गच्छों की अपेक्षा इस गच्छ के पट्टधर आचार्यों को कक्कसूरि, सर्वदेवसूरि और ननसूरि ये तीन अनुयायी श्रावकों और श्रमणों की संख्या अल्प थी। १६वीं नाम पुनः प्राप्त होते रहे। इस गच्छ का सर्वप्रथम उल्लेख वि.सं. शती से इस गच्छ से संबद्ध साक्ष्यों के नितांत अभाव से यह १२०१ के एक प्रतिमालेख में और अंतिम उल्लेख वि.सं. कहा जा सकता है कि इस गच्छ के अनुयायी मुनिजन और १६१९ में प्रतिलिपि की गई राजप्रश्रीय सूत्र की दाताप्रशस्ति में pariwariwaridwarni-dridadidaidaddard6 २१ 6dminirdinidroidiarinidairdrianarraiwand Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.212079
Book TitleSwetambar Sampraday ke gaccho ka Samatya Paricha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShivprasad
PublisherZ_Yatindrasuri_Diksha_Shatabdi_Smarak_Granth_012036.pdf
Publication Year1999
Total Pages14
LanguageHindi
ClassificationArticle & Jain Sangh
File Size2 MB
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