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________________ : भगवान् महावीर का दूसरा क्रान्तिकारी एवं साधना कर सके, राग-द्वेष को छोड़ सके तो कोई वैज्ञानिक विचार यह है कि मनुष्य जन्म से नहीं ऐसा कारण नहीं है कि वह प्रगति न कर सके । जब अपितु आचरण से महान बनता है। इस सिद्धान्त प्रत्येक व्यक्ति प्रगति कर सकता है, अपने ज्ञान और के आधार पर उन्होंने मनुष्य समाज की समस्त साधना के बल पर उच्चतम विकास कर सकता है दीवारों को तोड़ फेंका। आज भी मनुष्य और और तत्त्वतः कोई किसी की प्रगति में न तो बाधक मनुष्य के बीच खडी की गई जितने प्रकार की दीवारें है और न साधक तो फिर संघर्ष का प्रश्न ही कहाँ हैं उन सारी दीवारों को तोड़ देने की आवश्यकता उठता है ? इस तरह उन्होंने एक सामाजिक दर्शन - है। यदि हम यह मान लेते हैं कि 'मनुष्य जन्म से दिया। नहीं, आचरण से महान बनता है' तो जो जातिगत प्रत्येक जीव में आत्मशक्ति-सामाजिक समता विष है, समाज की शान्ति में एक प्रकार का जो विष एवं एकता की दृष्टि से श्रमण परम्परा का अप्रतिम घुला हुआ है, उसको हम दूर कर सकते हैं । जो महत्व है। इस परम्परा में मानव को मानव के ४। पढ़ा हुआ वर्ग है उसे निश्चित रूप से इसको सैद्धा __ रूप में देखा गया है; वर्णो, सम्प्रदायों, जाति, उपन्तिक रूप से ही नहीं अपितु इसे अपने जीवन में जाति, वादों का लेबिल चिपकाकर मानव मानव आचरण की हाष्ट से भा उतारना चाहिए। को बांटने वाले दर्शन के रूप में नहीं। मानव प्रत्येक व्यक्ति परमात्मा बन सकता है-प्रत्येक महिमा का जितना जोरदार समर्थन जैनदर्शन में व्यक्ति साधना के आधार पर इतना विकास कर हुआ है वह अप्रतिम है । भगवान महावीर ने आत्मा सकता है कि देवता लोग भी उसको नमस्कार करते को स्वतन्त्रता की प्रजातन्त्रात्मक उद्घोषणा की। हैं । 'देवा वि त्तं नमंसन्ति जस्स धम्म सया मणो !' उन्होंने कहा कि समस्त आत्माएँ स्वतन्त्र हैं । विव। महावीर ने ईश्वर की परिकल्पना नहीं की: देव- क्षित किसी एक द्रव्य तथा उसके गुणों एवं पर्यायों ताओं के आगे झुकने की बात नहीं की अपितु मान- का अन्य द्रव्य या उसके गुणों और पर्यायों के साथ वीय महिमा का जोरदार समर्थन करते हुए कहा किसी प्रकार का कोई सम्बन्ध नहीं है। कि जिस साधक का मन धर्म में रमण करता है उसे देवता भी नमस्कार करते हैं। व्यक्ति अपनी ही इसके साथ-साथ उन्होंने यह बात कही कि जीवन-साधना के द्वारा इतना उच्चस्तरीय विकास स्वरूप की दृष्टि से समरत आत्माएँ समान हैं । अस्तित्व की दृष्टि से समस्त आत्माएँ स्वतन्त्र हैं; कर सकता है कि आत्मा ही परमात्मा बन सकती है। भिन्न-भिन्न हैं, किन्तु स्वरूप की दृष्टि से समस्त आत्माएँ समान हैं। मनुष्य मात्र में आत्म-शक्ति जैन तीर्थकरों का इतिहास एवं उनका जीवन है । शारीरिक एवं मानसिक विषमताओं का कारण आकाश से पृथ्वी पर उतरने का क्रम नहीं है अपितु, कर्मों का भेद है । 'जीव' अपने ही कारण से संसारी । पृथ्वी से ही आकाश की ओर जाने का उपक्रम बना है और अपने ही कारण से मुक्त होगा। व्यव है । नारायण का नर शरीर धारण करना नहीं है हार से बन्ध और मोक्ष के हेतु अन्य पदार्थ को । अपितु नर का ही नारायण बनना है । वे अवतार- जानना चाहिए किन्तु निश्चय से यह जीव स्वयं वादी परम्परा के पोषक नहीं अपितु उत्तारवादा मोक्ष का हेतू है। आत्मा अपने स्वयं के उपाजित है। परम्परा के तीर्थंकर थे। उन्होंने अपने जीवन की कर्मों से ही बंधती है । आत्मा का दुःख स्वकृत है। । साधना के द्वारा, प्रत्येक व्यक्ति को यह प्रमाण प्रत्येक व्यक्ति ही प्रयास से उच्चतम विकास दिया; उसे यह विश्वास दिलाया कि यदि वह कर सकता है । तृतीय खण्ड : धर्म तथा दर्शन साध्वीरत्न कुसुमवती अभिनन्दन ग्रन्थ Jain Education International For private a Personal use only www.jainelibrary.org
SR No.211936
Book TitleVishwa Dharm ke Rup me jain Dharm Ki Prasangikta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMahaveer Saran Jain
PublisherZ_Kusumvati_Sadhvi_Abhinandan_Granth_012032.pdf
Publication Year1990
Total Pages8
LanguageHindi
ClassificationArticle & Religion
File Size2 MB
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