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________________ मौर्य चन्द्रगुप्त विशाखाचार्य जैन-जगत् के बड़े बड़े तपस्वी, वीतराग जितेन्द्रिय एवं मेधावी मुनियों, उपाध्यायों एवं आचायों ने अपने विचक्षण व्यक्तित्व के बल पर महान्-से-महान् सम्राटों को श्रमन-जीवन यापन केलिए प्रेरित किया यह बात जैन समाज के लिए गौरवपूर्ण एवं महिमामयी मानी जाएगी। इसी संदर्भ में हम मौर्यवंशी - संक्षिप्त सीमा के अन्तर्गत गुप्तवंशी - चन्द्रगुप्त का समयांकन करने चले हैं। एतन्निमित्त कुछ एक महत्वपूर्ण मुद्दों का सरल परिचय देना हम साम्प्रत समझते हैं । - मौर्यवंश: उक्त वंश की स्थापना किसने की ? इसका समाधान अब इतना जटिल नहीं रहा। अब इतिहासकार इस बात पर सहमत हुए जाते हैं कि मौर्यवंश की स्थापना नंदवंश में से आठवें नन्द 'मौर्यनन्द' ने की। इस प्रसंग में मौर्यनन्द का उल्लेख इसलिए भी अनिवार्य हो गया है कि जैन समाज का इतिहास मौर्यनन्द के युग से स्पष्ट-से स्पष्टतर होने लगा है। कहते हैं— मौर्यनन्द ने कलिंग देश पर आक्रमण किया था और वहां से महावीरस्वामी की प्रतिमा उठा लाया था। जैन-संदर्भों से यह भी ज्ञात हो जाता है कि आठवें नन्द (मौर्यनन्द) ने कलिंग पर कब आक्रमण किया था ? परन्तु उनको संदर्भ-संप्रेषित तिथि' भरोसे के योग्य नहीं है। यूनानी इतिहासकारों द्वारा प्रतिपादित भारतीय काल-संदर्भों के परिप्रेक्ष्य में हम जानते हैं कि आठवें नन्द ने ४५१ ई० पू० में कलिंग देश पर आक्रमण किया था। इस बात की पुष्टि 'खारवेल-प्रशस्ति' नाम से विख्यात अभिलेख से हो जाती है। इस प्रकार जैन इतिहास से जुड़ े हुए मौर्य नन्द को हम मौर्यवंश का प्रथम पुरुष मानते हैं। चन्द्रगुप्त मौर्य नाम से विख्यात मगध सम्राट् क्या मौर्यनन्द का पुत्र है ? इस प्रश्न के समाधान में 'अस्ति' और 'नास्ति'- दोनों किस्म के उत्तर मिलते हैं । जहाँ तक जैन-साक्ष्य का सम्बन्ध है, उससे पता चलता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य पुत्र है। इस स्थापना की दृढ़तर पुष्टि 'मुद्राराक्षस' नामक संस्कृत नाटक से भी हो जाती है । परन्तु हम समझते हैं कि कालगत वैषम्य के कारण मौर्यनन्द और चन्द्रगुप्त के दरम्यान पिता-पुत्र के रिश्ते की संभावना क्षीण है । 'नन्द' की भ्रान्ति में आकर लोग-बाग चन्द्रगुप्त मौर्य को पद्मनन्द का पुत्र मान बैठे हैं । यह भी अश्रद्धेय प्रसंग है। मौर्यनन्द और चन्द्रगुप्त मौर्य के मध्य तीसरे व्यक्ति की चर्चा एक वरेण्य सत्य के रूप में सामने आ रही है। मौर्यनन्द के एवं चन्द्रगुप्त के पिता के रूप में 'पूर्वनन्द' का उल्लेख ' मनोरंजक भी है और अभिनन्दनीय भी है । यही कारण है कि 'कामन्दकीय नीतिसार' के टीकाकार ने लिखा है ''यह चन्द्रगुप्त का विशेषण है। इन संदर्भों के आलवाल में विकसित मौर्यवंश का परिचय इस प्रकार है : पुत्र १. जैन काल-गणना विषयक प्राचीन परम्परा (हिमवन्त थेरावली) से ज्ञात होता है कि वीरनिर्वाण संवत् १४९३७८ ई० पू० में झाटवेंनद ने कलिंग पर चढ़ाई की थी। यह विश्वसनीय नहीं है। कारण, ४३०-३४२ ईसवी पूर्व में मगध पर नवम नंद शासन कर रहा था। अलबत्ता यदि यह संख्या वीरजन्म से मान ली जाय तो यथार्थपरक हो भी सकती है। यथा ५६६-१४६ ४५० ई० पू० में आटवें नन्द ने कलिंग पर आक्रमण किया होगा । २. वेदवाणी, बहालगढ़ (सोनीपत) वर्ष ३३, अंक ७. ३. वीर निर्वाण-संवत् और जैन काल-गणना मृनि कल्याण विजय; पृष्ठ १६६ । ४. द्रष्टव्य अंक २ और श्लोक संख्या ६ । - श्री चन्द्रकान्त बाली, शास्त्री (क) पूर्वनन्दनं कुर्यात् चन्द्रगुप्तं हि भूमिपम् ॥ (ख) योग यशः शेषे पूर्व नन्दसुतस्ततः । चन्द्रगुप्तः कृतो राजा चाणक्येन महौजसा ।। अंग इतिहास, कला और संस्कृति ५. Jain Education International For Private & Personal Use Only - कथा सरित्सागर : १४/११९ - ७३ www.jainelibrary.org
SR No.211768
Book TitleMaurya Chandragupta Vishakhacharya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorChandrakant Bali
PublisherZ_Deshbhushanji_Maharaj_Abhinandan_Granth_012045.pdf
Publication Year1987
Total Pages2
LanguageHindi
ClassificationArticle & Ascetics
File Size750 KB
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