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________________ भगवान् महावीर का जीवन-दर्शन श्री नीरज जैन सर्वान्तवत् तद्गुणमुख्यकल्प, सर्वान्तशून्यम् च मिथोऽनपेक्षम् । सर्वापदामन्तकरं निरन्तम् सर्वोदयं तीर्थमिदम् तवैव । दो हजार वर्ष पूर्व आचार्य समन्तभद्र द्वारा रचे गये इस पद्य में भगवान महावीर के तीर्थ को "सर्वोदय तीर्थ" के रूप में ध्याख्यापित किया गया है। सर्वोदय का अर्थ है-सबका उदय । सबका कल्याण । सर्वोदय की इसी लोक-कल्याणकारी भावना में भगवान महावीर का सम्पूर्ण जीवन-दर्शन समाया हुआ है । उन्होंने सत्य को, अहिंसा को, अस्तेय को, ब्रह्मचर्य को और अपरिग्रह को, इसी सर्वोदय तीर्थ की प्रतिष्ठा का साधन मानते हुए मानव समाज का दिग्दर्शन किया है। महावीर का जीवन-दर्शन, जीवन की एक विधेय पद्धति है । यह मत करो, वह मत करो, यहां मत आओ, वहां मत जाओ, इसे मत देखो, उसे मत जानो, आदि आदि निषेध-परक अनुबन्धों में उनका जीवन-दर्शन नहीं बांधा जा सकता। महावीर हमें जीवन से पलायन करने की सीख नहीं देते। वे तो जीवन को विकास और उत्कर्ष के मार्ग पर अग्रेषित करके आत्मा को परमात्मा बनाने की कला हमें सिखाते हैं। जीवन के उत्कर्ष की इस यात्रा में "आत्म बोध"-अपने आपको जान लेना-पहली और अनिवार्य शर्त है। स्वयं को जाने बिना आत्म-साधना का वह पथ हमारे समक्ष प्रशस्त ही नहीं होता जिस पर भगवान महावीर हमें चलाना चाहते हैं । इस आत्मबोध की दुलंभता को एक मित्र ने दो पंक्तियों में बांधा है जमाने में उसने बड़ी बात कर ली, खुद अपने से जिसने मुलाकात कर ली। मन, वाणी और शरीर, यही तीन मुख्य उपकरण मनुष्य के पास होते हैं। हम यह भी कह सकते हैं कि मानव के समस्त क्रियाकलापों का आधार यह मन, वचन, काय ही हैं। पुण्य हो या पाप, उपकार हो या अपकार, वासना हो या साधना, भोग हो या तप-त्याग, परहित हो या पर-पीड़न, भलाई हो या बुराई, इन सबकी सार्थकता या अनुचरण मन-वचन-काय के सहयोग के बिना संभव ही नहीं हो सकता। भगवान महावीर ने इन तीनों ही शक्तियों को परिष्कृत करके, मानव-जीवन को संवारने का संदेश दिया है। संक्षेप में यदि कहा जाए तो-आचरण में अहिंसा, वाणी में स्याद्वाद, विचारों में अनेकान्त, बस, यही है महावीर का जीवन सिद्धान्त । अपने आचरण को ऐसा संयत और सुसंस्कृत बनाना जिससे दूसरों को शारीरिक या मानसिक, कैसी भी पीड़ा न पहुंचे, यह अहिंसा की मोटी परिभाषा है। महावीर ने जीव मात्र के लिए अहिंसा की उपादेयता को पग-पग पर समर्थन दिया है । अहिंसा सबसे पहले हमें दूसरे के अस्तित्व का बोध कराती है। सबकी सुविधा या असुविधा का आकलन कराती है। वह सबके जीवित रहने के अधिकार का उद्घोष करती है। भगवान महावीर इस स्थूल हिंसा से छुड़ा कर हमें उस सूक्ष्म और मानसिक हिंसा से भी मुक्त कराना चाहते हैं जो हम अपने शरीर से नहीं, किन्तु मन से, निरन्तर करते रहते हैं। उन्होंने उसे "भाव हिंसा" का नाम दिया है। झूठ, चोरी, व्यभिचार और परिग्रह, ये सब इसी हिंसा के प्रकार-मात्र हैं । यही पांच पाप हैं और इनसे बचकर अपना जीवन निर्वाह करना ही आचरण की अहिंसा है। महावीर ने इस बात पर अधिक जोर दिया है कि हम शरीर की क्रिया के अलावा, मन से भी इन पापों के भागीदार न बनें, ऐसी सावधानी रखनी चाहिए । वे कहते हैं कि मन की इस चपलता के शिकार ऐसे असंख्य जीव हैं जिन्होंने दूसरे को कभी कोई पीड़ा नहीं पहुंचाई परन्तु उनका मन हिंसा का घोर अपराधी है । असंख्य ऐसे हैं जो कभी किसी का कुछ खींच तो नहीं पाये पर प्रतिपल चोर हैं । ऐसे लोगों की गिनती भी संभव नहीं जिन्होंने यद्यपि कभी किसी पर आंख तक नहीं उठाई पर उनके मन ने अनवरत व्यभिचार किया है । तृष्णा और लोभ के मारे ऐसे १०८ आचार्यरत्न श्री देशभूषण जी महाराज अभिनन्दन ग्रन्थ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.211524
Book TitleMahavir ka Jivan Darshan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNiraj Jain
PublisherZ_Deshbhushanji_Maharaj_Abhinandan_Granth_012045.pdf
Publication Year1987
Total Pages2
LanguageHindi
ClassificationArticle & Tirthankar
File Size379 KB
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