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________________ ३८ : सरस्वती-वरदपुत्र पं० बंशीधर व्याकरणाचार्य अभिनन्दन-ग्रन्थ करनेका सतत प्रयत्न करना चाहिये। इतनी बात अवश्य है कि कोई भी चारित्र तब तक 'व्यवहारसम्यक चारित्र' नाम नहीं पा सकता है जब तक कि वह चारित्र सम्यग्दर्शनके सद्भावमें न हो, जैसाकि पूर्व में हम स्पष्ट कर आये है। इस प्रकार आगमप्रमाणके आधार पर किये गये उपर्युक्त विवेचनसे यह मान्यता, कि 'जिस जीवको निश्चयसम्यकचारित्रकी प्राप्ति हो जाती है उसके व्यवहारसम्य चारित्र अनायास ही हो जाता है उसे उसकी प्राप्तिके लिये पुरुषार्थ नहीं करना पड़ता है," निश्चित रूपमें खण्डित हो जाती है। इतना स्पष्ट विवेचन करने पर भी अब यदि कोई व्यक्ति यह कहता है कि व्यवहारमोक्षमार्ग तो संसारका ही कारण है, मोक्षका नहीं, तो उसका ऐसा कहना भी दुराग्रहपूर्ण ही माना जायगा । इसका स्पष्टीकरण इस प्रकार है कि यदि व्यवहारमोक्षमार्ग संसारका ही कारण है मोक्षका नहीं, तो फिर उसे आगममें 'मोक्षमार्ग' शब्दसे पकारना ही असंगत है । दूसरी बात यह है कि संसारका मुख्य कारण तो मोहनीयकर्मके उदयसे होनेवाले जीवके मिथ्यादर्शन, 'मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्ररूप परिणाम ही है । यद्यपि यह बात सत्य है कि व्यवहारसम्यग्दर्शन, व्यवहारसम्यग्ज्ञान और व्यवहारसम्यक चारित्रको प्राप्त करके भी जीव जब तक निश्चय-सम्यग्दर्शन, निश्चयसम्यग्ज्ञान और निश्चयसम्यकचारित्रको प्राप्त नहीं कर लेता है तब तक उसे मोक्षका प्राप्त होना असंभव है। अर्थात वह तब तक संसारमें हो रहा करता है। परन्तु इस आधार पर उन व्यवहारसम्यग्दर्शनादिकको सर्वथा संसारका ही कारण मान लेना असंगत बात है । फिर भी इतना तो माना जा सकता है कि चूंकि व्यवहार-सम्यग्दर्शनादिक निश्चय-सम्यग्दर्शनादिककी उत्पत्तिमें कारण होते हैं अतः इस रूपमें वे कथंचित् मोक्षके भी कारण है और चूँकि व्यवहार-सम्यग्दर्शनादिकके सद्भावमें भी जीवको जब तक निश्चय-सम्यग्दर्शनादिककी उपलब्धि नहीं हो जाती तब तक मोक्षकी प्राप्ति असंभव है । अतः उनमें कथंचित् संसारकी कारणता स्वीकार करना भी असंगत नहीं है। इस स्पष्टीकरणमें कही हुई इन सब बातोंको समझने के लिये यहाँ पर थोड़ा करणानुयोगकी दृष्टिसे भी सम्यग्दर्शनादिकके सम्बन्धमें विचार किया जा रहा है। करणानुयोगकी दृष्टिसे निश्चय और व्यवहार सम्यग्दर्शनादिकका स्वरूप इसके पूर्व कि हम करणानुयोगकी दृष्टिसे निश्चय और व्यवहार सम्यग्दर्शनादिकका विवेचन करें, आवश्यक जानकर करणानुयोगके सम्बन्धमें ही कुछ विवेचन कर देना चाहते हैं । करणानुयोगमें पठित 'अनुयोग' शब्दका अर्थ आगम होता है। इस तरह सम्पूर्ण जैनागमको यदि विभक्त किया जाय तो वह चार भागोंमें विभक्त हो जाता है-प्रथमानुयोग, चरणानुयोग, करणानुयोग और द्रव्यानयोग। इनमेंसे प्रथमानुयोग वह है जिसमें अध्यात्मको लक्ष्यमें रखकर महापुरुषोंके जीवनचरित्रके आधारपर पाप, पुण्य और धर्मके फलका दिग्दर्शन कराया गया है। चरणानयोग वह है जिसमें अध्यात्मको लक्ष्यमें रखकर पाप, पुण्य और धर्म की व्यवस्थाओंका निर्देश किया गया है । करणानुयोग वह है जिसमें जीवोंकी पाप, पुण्य और धर्ममय परिणतियों तथा उनके कारणोंका विश्लेषण किया गया है और द्रव्यानुयोग वह है जिसमें विश्वको सम्पूर्ण वस्तुओंके पृथक् अस्तित्वको बतलाने वाले स्वतःसिद्ध स्वरूप एवं उनके परिणमनोंका निर्धारण किया गया है। यहाँपर हम इन सब अनुयोगोंके आधारपर वस्तुस्वरूपपर प्रकाश न डाल कर प्रकरणके लिये उपयोगी प्रतिज्ञात करणानयोगके आधारपर ही वस्तुस्वरूपपर प्रकाश डाल रहे हैं। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.211283
Book TitleNischay aur Vyavahar Moksh Marg
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBansidhar Pandit
PublisherZ_Bansidhar_Pandit_Abhinandan_Granth_012047.pdf
Publication Year1989
Total Pages20
LanguageHindi
ClassificationArticle & Religion
File Size2 MB
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