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________________ 66. जैन विद्या के आयाम खण्ड-६ - देखें नन्दीसूत्र स्थविरावली, गाथा 36-41 / मोहक्षपकक्षीणमोहजिना: क्रमशोऽसंङ्ख्येयगुण निर्जराः।। 64. पच्छा तेण एगिंदियजीवसाहणं गोविंदणिज्जत्ती कया। एस णाणतेणो। - तत्त्वार्थसूत्र (उमास्वाति) सुखलाल संघवी, 9.47 / एव दंसणपभावगसत्थट्ठा। ७१अ.णिज्जुत्ती णिज्जुत्ती एसा कहिदा मए समासेण। -निशीथचूर्णि, पृ० 260 अह वित्थार पंसगोऽणियोगदो होदि णादव्वो।। 65. निण्हयाण वत्तव्वया भाणियव्वा जहा सामाइयनिज्जुत्तीए। आवासगणिज्जुत्ती एवं कधिदा समासओ विहिणा। - उत्तराध्ययनचूर्णि, जिनदासगणिमहत्तर, विक्रम संवत् 1989, णो उवजूंजदि णिच्चं सो सिद्धिं, जादि विसुद्धप्पा।। पृ० 95 / - मूलाचार (भारतीय ज्ञानपीठ) 691-692 / इदाणिं एतेसिं कालो भण्णति 'चउद्दस सोलस वीसा' गाहाउ दो, एसो अण्णो गंथो कप्पदि पढिदुं असज्झाए। इदाणिं भण्णति आराहणा णिज्जुत्ति मरणविमत्ती य संगहत्थुदिओ। 'चोद्दस वासा तइया" गाथा अक्खाणयसंगहणी। वही, पृ० 95 / पच्चक्खाणावसय धम्मकहाओ एरिस ओ।। 67. मिच्छद्दिट्ठी सासायणे य तह सम्ममिच्छदिट्ठी य। - मूलाचार, 278-279 / अविरयसम्मद्दिट्ठी विरयाविरए पमत्ते य।।। (ब) ण वसो अवसो अवसस्सकम्ममावस्सयंति बोधव्वा। तत्तो य अप्पमत्तो नियट्ठि अनियट्ठि बायरे सुहमे। जुत्ति त्ति उवाअंति ण णिरवयवो होदि णिज्जुत्ती।। उवसंत खीणमोहे होइ सजोगी अजोगी य।। -मूलाचार, 515 // - आवश्यकनियुक्ति, (नियुक्तिसंग्रह, पृ० 140) 72. ण वसो अवसो अवसस्स कम्म वावस्सयं ति बोधव्वा। 68. आवश्यकनियुक्ति (हरिभद्र) भाग 2, प्रकाशक श्री भेरुलाल कन्हैया जुत्ति त्ति उवाअंति य णिरवयवो होदि णिजुत्ती।। लाल कोठारी धार्मिक ट्रस्ट, मुम्बई, वीर सं. 2508, पृ० 106 -नियमसार, गाथा 142, लखनऊ, 1931 / 73. देखें- कल्पसूत्र, स्थविरावली विभाग। 69. सम्मत्तुपत्ती सावए य विरए अणंतकम्मसे। 74. देखें-मूलाचार षडावश्यक-अधिकार। दंसणमोहक्खवए उवसामंते य उवसते।।। 75. थेरस्स णं अज्ज विन्हुस्स माढरस्सगुत्तस्स अज्जकालए थेरे अंतेवासी खवए य खीणमोहे जिणे अ सेढी भवे असंखिज्जा। गोयमसगुत्ते थेरस्सणं अज्जकालस्स गोयमसगुत्तस्स इमे दुवे थेरा तव्विवरीओ कालो संखज्जगुणाइ सेढीए।। अंतेवासी गोयमसगुत्ते अज्ज संपलिए थेरे अज्जभद्दे, एएसि दुन्हवि -आचारांगनियुक्ति, गाथा 222-223 (नियुक्तिसंग्रह, पृ०४४१) गोयमसगुत्ताणं अज्ज बुढे थेरे। 70. सम्यग्दृष्टिश्रावकविरतानन्तवियोजकदर्शनमोहक्षपकोपशमकोपशान्त - कल्पसूत्र (मुनि प्यारचन्दजी, रतलाम) स्थविरावली, पृ० 233 / 107 / Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.211277
Book TitleNiryukti Sahitya Ek Punarchintan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSagarmal Jain
PublisherZ_Shwetambar_Sthanakvasi_Jain_Sabha_Hirak_Jayanti_Granth_012052.pdf
Publication Year1998
Total Pages6
LanguageHindi
ClassificationArticle & Agam
File Size2 MB
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