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________________ 58 जैन विद्या के आयाम खण्ड-६ थेरा य गुट्ठमाहिलपुट्ठबद्धं परुविंति।। जिट्ठा सुदंसण जमालि अणुज्ज सावत्थि तिंदुगुज्जाणे। पंच सया य सहस्सं ढकेण जमालि मुत्तूणं।। रायगिहे गुणसिलए वसु चउदसपुचि तीसगुत्ताओ। आमलकप्पा नयरि मित्तसिरी कूरपिंडादि।। सियवियपोलासाढे जोगे तद्दिवसहिययसूले य। सोहम्मि नलिणगुम्मे रायगिहे पुरिय बलभद्दे / / मिहिलाए लच्छिघरे महगिरि कोडिन्न आसमित्तो / णेउणमणुप्पवाए रायगिहे खंडरक्खा य।। नइखेडजणव उल्लग महगिरि धणगुत्त अज्जगंगे य। किरिया दो रायगिहे महातवो तीरमणिनाए।। पुरिमंतरंजि भुयगुह बलसिरि सिरिगुत्त रोहगुतते य। परिवाय पुट्टसाले घोसण पडिसेहणा वाए।। विच्छ्य सप्पे मूसग मिगी वराही य कागि पोयाई। एयाहिं विज्जाहिं सो उ परिव्वायगो कुसलो।। मोरिय नउलि बिराली वग्घी सीही य उलुगि ओवाइ। एयाओ विज्जाओ गिण्ह परिव्वायमहणीओ।। दसपुरनगरुच्छुघरे अज्जरक्खिय पुसमित्तत्तियगं च। गुट्ठामाहिल नव अट्ठ सेसपुच्छा य विंझस्स।। पुट्ठो जहा अबद्धो कंचुइणं कंचुओ समन्नेइ। एवं पुट्ठमबद्धं जीवं कम्मं समन्त्रेइ।। पच्चक्खाणं सेयं अपरिमाणेण होइ कायव्वं / जेसिं तु परीमाणं तं दुर्ल्ड होइ आसंसा।। रहवीरपुरं नयरं दीवगमुज्जाण अज्जकण्हे अ। सिवभूइस्सुवहिमि पुच्छा थेराण कहणा य।। - उत्तराध्ययननियुक्ति, 165-178 / 18. वही, 29 / 19. दशवैकालिकनियुक्ति, गाथा 309-326 / 20. उत्तराध्ययननियुक्ति, 207 / 21. दशवैकालिकनियुक्ति, 161-163 / 22. आचारांगनियुक्ति, गाथा 5 / 23. (अ) दशवैकालिकनियुक्ति, 79-88 / (ब) उत्तराध्ययननियुक्ति, 143-144 / 24. जो चेव होइ मुक्खो सा उ विमुत्ति पगयं तु भावेणं। देसविमुक्का साहू सव्वविमुक्का भवे सिद्धा।। -आचारांगनियुक्ति, 331 // 25. उत्तराध्ययननियुक्ति, 497-92 / 26. सूत्रकृतांगनियुक्ति, गाथा 99 / 27. दशवैकालिकनियुक्ति, गाथा 3 / 28. सूत्रकृतांगनियुक्ति, 127 / 29. उत्तराध्ययननियुक्ति, 267-268 / 30. दशाश्रुतस्कंधनियुक्ति, गाथा 1 / 31. तहवि य कोई अत्यो उप्पज्जति तम्मि तंमि समयंमि। पुव्वभणिओ अणुमतो अ होइ इसिभासिएसु जहा।। -सूत्रकृतांगनियुक्ति, 1892 / ३२क.बृहत्कल्पसूत्रम्, षष्ठ विभाग, प्रकाशक- श्री आत्मानन्द जैन सभा भावनगर, प्रस्तावना, पृ० 4,5 33. वही आमुख, पृ० 2 ३४क. मूढणइयं सुयं कालियं तु ण णया समोयरंति इहं। अपुहुत्ते समोयारो, नस्थि पुहुत्ते समोयारो।।। जावंति अज्जवइरा, अपुहुत्तं कालियाणुओगे य। तेणाऽऽरेण पुहत्तं, कालियसुय दिट्ठिवाए य।। - आवश्यकनियुक्ति, गाथा 762-763 / (ख) तुंबवणसन्निवेसाओ, निग्गयं पिउसगासमल्लीणं। छम्मासियं छसु जयं, माऊय समन्त्रियं वंदे।। जो गुज्झएहिं बालो, निमंतिओ भोयणेण वासंते। णेच्छइ विणीयविणओ, तं वइररिसिं णमंसामि।। उज्जेणीए जो जंभगेहिं आणक्खिऊण थुयमहिओ। अक्खीणमहाणसियं सीहगिरिपसंसियं वंदे।। जस्स अणुण्णाए वायगत्तणे दसपुरम्मि णयरम्मि। देवेहिं कया महिमा, पयाणुसार णमसामि।। जो कन्नाइ घणेण य, णिमंतिओ जुव्वणम्मि गिहवइणा। नयरम्मि कुसुमनामे, तं बइररिसिं णमंसामि।। जणुद्धारआ विज्जा, आगासगमा महारिण्णाओ। वंदामि अज्जवइरं, अपच्छिमो जो सुयहराणं।। - वही, गाथा 764-769 / अपहुत्ते अणुओगो, चत्तारि दुवार भासई एगो। पुहुताणुओगकरणे, ते अत्थ तओ उ वोच्छिन्त्रा।। देविंदवंदिएहिं, महाणुभागेहि रक्खिअज्जेहिं। जुगमासज्ज विभत्तो, अणुओगो तो कओ चउहा।। माया य रुद्दसोमा, पिया य नामेण सोमदेव त्ति। भाया य फग्गुरक्खिय, तोसलिपुत्ता य आयरिआ।। णिज्जवणभद्गुत्ते, वीसं पढणं च तस्स पुवगर्य। पव्वाविओ य भाया, रक्खिअखमणेहिं जणओ य।। -वही, गाथा 773-776 / 35. जह जह पएसिणी जाणुगम्मि पालित्तओ भमाडेइ। तह तह सीसे वियणा, पणस्सइ मुरुंडरायस्स।। -पिण्डनियुक्ति, गाथा- 498 // 36. नइ कण्ह-विन्न दीवे, पंचसया तावसाण णिवसंति। पव्वदिवसेसु कुलवइ, पालेवुत्तार सक्कारे।। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org:
SR No.211277
Book TitleNiryukti Sahitya Ek Punarchintan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSagarmal Jain
PublisherZ_Shwetambar_Sthanakvasi_Jain_Sabha_Hirak_Jayanti_Granth_012052.pdf
Publication Year1998
Total Pages6
LanguageHindi
ClassificationArticle & Agam
File Size2 MB
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