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________________ 366 जैन विद्या के आयाम खण्ड-६ है। हरिभद्र संयोग से उस युग में उत्पन्न हुए जब पारस्परिक को प्रोत्साहित किया अपितु शिवमन्दिर में स्वयं उपस्थित होकर अपने आलोचना-प्रत्यालोचना अपनी चरम सीमा पर थी। फिर भी हरिभद्र उदारवृत्ति का परिचय भी दिया। हेमचंद्र के समान इस उदार परम्परा न केवल अपनी समालोचनाओं में संयत रहे अपितु उन्होंने सदैव ही का निर्वाह अन्य जैनाचार्यों ने भी किया था, जिसके अभिलेखीय प्रमाण अन्य परम्पराओं के आचार्यों के प्रति आदरभाव प्रस्तुत किया। आज भी उलब्ध होते हैं। दिगम्बर जैनाचार्य रामकीर्ति ने तोकलजी शास्त्रवार्तासमुच्चय उनकी इस उदारवृत्ति और सहिष्णुदृष्टि की परिचायक में मंदिर के लिए और श्वेताम्बर आचार्य जयमंगलसूरि ने चामुण्डा के एक महत्त्वपूर्ण कृति है। बौद्ध दर्शन की दार्शनिक मान्यताओं की समीक्षा मन्दिर के लिए प्रशस्ति-काव्य लिखे। उपाध्याय यशोविजय की धार्मिक करने के उपरान्त वे कहते हैं कि बुद्ध ने जिन क्षणिकवाद, अनात्मवाद सहिष्णुता का उल्लेख हम पूर्व में कर ही चुके है। उनका यह कहना और शून्यवाद के सिद्धान्तों का उपदेश दिया, वह वस्तुत: ममत्व के कि माध्यस्थ या सहिष्णु भाव ही धर्मवाद है, धार्मिक सहिष्णुता का विनाश और तृष्णा के उच्छेद के लिए आवश्यक ही था। वे भगवान् मुद्रालेख है। इसी प्रकार जैन रहस्यवादी सन्तकवि आनन्दधन भी बुद्ध को अर्हत्, महामुनि और सुवैद्य की उपमा देते हैं और कहते कहते हैंहैं कि जिस प्रकार एक अच्छा वैद्य रोगी के रोग और प्रकृति को ध्यान षडदर्शन जिन अंगभणोजे न्यायषडंग जे साधे रे। में रखकर एक ही रोग के लिए भिन्न-भित्र रोगियों को भिन्न-भिन्न औषधि नमिजिनवरना चरम उपासक षड्दर्शन आराधे रे।। प्रदान करता है, उसी प्रकार भगवान् बुद्ध ने अपने अनुयायियों के अर्थात् सभी दर्शन जिन के अंग हैं और जिन का उपासक सभी विभिन्न स्तरों को ध्यान में रखते हुए इन विभिन्न सिद्धान्तों का उपदेश दर्शनों की उपासना करता है। जैनों की यह उदार और सहिष्णुवृत्ति दिया है। ऐसा ही उदार दृष्टिकोण वे सांख्य दर्शन के प्रस्तोता महामुनि वर्तमान युग तक यथार्थतः जीवित है। आज भी जैनों की सर्वप्रिय कपिल और न्यायदर्शन के प्रतिपादकों के प्रति भी व्यक्त करते हैं। प्रार्थना का प्रारम्भ इसी उदार भाव के साथ होता हैकपिल के लिए भी वे महामुनि शब्द का प्रयोग कर अपना आदर जिसने रागद्वेष कामादिक जीते, सब जग जान लिया। भाव प्रकट करते हैं। 32 विभिन्न विरोधी दार्शनिक विचारधाराओं में किस सब जीवों को मोक्ष मार्ग का, निस्पृह हो उपदेश दिया। प्रकार संगति स्थापित की जा सकती है इसका एक अच्छा उदाहरण बुद्ध वीर जिन हरि हर ब्रह्मा, या उसको स्वाधीन कहो। उनका यह ग्रन्थ है। भक्तिभाव से प्रेरित हो, यह चित्त उसी में लीन रहो। . 12 वीं शताब्दी के पसिद्ध जैनाचार्य हेमचन्द्र ने भी इसी प्रकार वस्तुत: यदि हम विश्व में शान्ति की स्थापना चाहते हैं, यदि मार्मिक सहिष्णुता और उदारवृत्ति का परिचय दिया है। उन्होंने न केवल हम चाहते हैं कि मनुष्य-मनुष्य के बीच घृणा और विद्वेष की भावनाएँ भगवान् शिव की स्तुति में महादेवस्तोत्र की रचना की अपितु शिवमन्दिर समाप्त हों और सभी एक-दूसरे के विकास में सहयोगी बनें, तो हमें में जाकर शिव की वन्दना करते हुए कहा- जिसने संसार परिभ्रमण आचार्य अमितगति के निम्न चार सूत्रों को अपने जीवन में अपनाना के कारणभूत राग-द्वेष के तत्वों को क्षीण कर दिया है, उसे मैं प्रणाम होगा। वे कहते हैं३३करता हूँ चाहे वह ब्रह्मा हो, विष्णु हो, शिव हो या जिन। जैनों की सत्वेषु मैत्री गुणिषु प्रमोदं, क्लिष्टेषु जीवेषु कृपापरत्वम्। इस धार्मिक उदारता का एक प्रमाण यह भी है कि महाराजा कुमारपाल माध्यस्थ भावं विपरीतवृत्तौ, सदा ममात्मा विदधातु देव।। और विष्णुवर्धन ने जैन होकर भी शिव और विष्णु के अनेक मन्दिरों हे प्रभु! प्राणीमात्र के प्रति मैत्रीभाव, गुणीजनों के प्रति समादरभाव, का निर्माण करवाया और उनकी व्यवस्था के लिए भूमिदान किया। दुःख एवं पीड़ित जनों के प्रति कृपाभाव तथा विरोधियों के प्रति कुमारपाल के धर्मगुरु आचार्य हेमचन्द्र ने न केवल उसकी इस उदारवृत्ति माध्यस्थभाव-समताभाव मेरी आत्मा में सदैव रहे। 1. आयाणे अज्जो सामाइए, आयाणे अज्जो सामाइयस्स अट्ठे- पं० परमेष्ठीदास न्यायतीर्थ, प्रका० सत्साहित्य प्रकाशन एवं प्रचार व्याख्याप्रज्ञप्तिसूत्र, संपा० मधुकरमुनि, प्रका० श्री आगम प्रकाशन विभाग, श्री कुन्दकुन्द महान जैन दिगम्बर तीर्थ सुरक्षा ट्रस्ट, जयपुर, समिति, ब्यावर, 1992, 1/9. 1988, 156 / समियाए धम्मे आरिएहिं पवेइए-आचारांगसूत्र, संपा० मुधकरमुनि, 8. एवाई मिच्छद्दिट्ठिस्स मिच्छत्तपरिग्गहियाई मिच्छसुयं एयाणि चेव प्रका० श्री आगम प्रकाशन समिति, ब्यावर, 1980, 1/8/3. सम्मदिट्ठिस्स सम्मत्तपरिहियाई सम्मसुयं अहवा मिच्छदिट्ठिस्स वि धर्म जीवन जीने की कला-पृ० 7-8. सम्मसुयं कम्हा? सम्मत्तहेउत्तणओ, जम्हा ते मिच्छदिट्ठिया तेहिं चेव 4. योगदृष्टिसमुच्चय, हरिभद्र, विजय कमल केशर ग्रन्थमाला, खम्भात्, समएहिं चोइया समाणा केइ सपक्खदिट्ठीओ वयेति से तं मिच्छसुयं। वि०सं० 1992, 137. नन्दीसूत्र, प्रका० धर्मदास जैन मित्र मंडल, रतलाम, सं० 2005, आचारांगसूत्र, संपा० मधुकर मुनि, प्रका० श्री आगम प्रकाशन 72 / समिति, ब्यावर, 1980, 1/4/2. ९अ. भगवती-अभयदेवकृत वृत्ति, प्रका० केशरीमल जेन, श्वेताम्बर योगदृष्टिसमुच्चय, हरिभद्र, विजय कमल केशर ग्रन्थमाला, सम्वत्, संस्था, सूरत, 1937, 14/7/ पृ० 1188 / वि०सं० 1992, 133. " मुक्खमग्ग पवन्नानं सिनेहो वज्जसिंखला। णाणाजीवा णाणा कम्मं णाणाविहं हवे लद्धी। वीरे जीवन्तए जाओ गोयम जं न केवलि।। तम्हा वयणविवादं सगपरसमएहि वज्जिजो।। -नियमसार, अनु० -उघृतत कल्पसूत्र टीका विनयविजय, प्रका० हीरालाल जैन, mi) Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.211215
Book TitleDharmik Sahishnuta aur Jain Dharm
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSagarmal Jain
PublisherZ_Shwetambar_Sthanakvasi_Jain_Sabha_Hirak_Jayanti_Granth_012052.pdf
Publication Year1998
Total Pages3
LanguageHindi
ClassificationArticle & Religion
File Size2 MB
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