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________________ ४८२ जैन विद्या के आयाम खण्ड-६ दार्शनिक विधा के रूप में उसका ज्ञानमीमांसीय एवं तत्त्वमीमांसीय पक्ष तो हुए। चाहे बुद्ध की मूलभूत जीवनदृष्टि निवृत्तिमार्गी रही हो, किन्तु उनके है ही, किन्तु इसके साथ ही उसकी अपनी एक जीवन दृष्टि भी होती है मध्यममार्ग के आधार पर ही परवर्ती बौद्ध आचार्यों ने वज्रयान या सहजयान जिसके आधार पर उसकी साधना के लक्ष्य एवं साधना-विधि का निर्धारण का विकास कर भोगमूलक जीवनदृष्टि को समर्थन देना प्रारम्भ कर दिया। होता है। वस्तुत: किसी भी दर्शन की जीवनदृष्टि ही एक ऐसा तत्त्व है, जो गुह्यसमाज तन्त्र में कहा गया है। उसकी ज्ञानमीमांसा, तत्त्वमीमांसा एवं साधना विधि को निर्धारित करता है सर्वकामोपभोगैश्च सेव्यमानैर्यथेच्छतः । और इन्हीं सबसे मिलकर उसका दर्शन एवं साधनातंत्र बनता है। ___ अनेन खलु योगेन लघु बुद्धत्वमाप्नुयात् ॥ व्यावहारिक रूप में वे साधना पद्धतियाँ जो दीक्षा, मंत्र, यंत्र, दुष्करैर्नियमैस्तीत्रैः सेव्यमानो न सिद्धयति । मुद्रा, ध्यान, कुण्डलिनी शक्ति जागरण आदि के माध्यम से व्यक्ति के सर्वकामोपभोगैस्तु सेवयंश्चाशु सिद्धयति । पाशविक या वासनात्मक पक्ष का निवारण कर उसका आध्यात्मिक विकास भोगमूलक जीवनदृष्टि के समर्थकों का तर्क यह है कि कामोपभोगों करती है या उसे देवत्व के मार्गपर आगे ले जाती है, तंत्र कही जाती है। से विरत जीवन बिताने वाले साधकों में मानसिक क्षोभ उत्पन्न होते होंगे, किन्तु यह तंत्र का प्रशस्त अर्थ है और अपने इस प्रशस्त अर्थ में जैन धर्म- कामभोगों की ओर उनकी इच्छा दौड़ती होगी और विनय के अनुसार वे उसे दर्शन को भी तंत्र कहा जा सकता है, क्योंकि उसकी अपनी एक सुव्यवस्थित, दबाते होंगे, परन्तु क्या दमनमात्र से चित्तविक्षोभ सर्वथा चला जाता होगा, सुनियोजित साधना-विधि है, जिसके माध्यम से व्यक्ति वासनाओं और दबायी हुई वृत्तियाँ जाग्रतावस्था में न सही, स्वप्नावस्था में तो अवश्य ही कषायों से ऊपर उठकर आध्यात्मिक विकास के मार्ग में यात्रा करता है। चित्त को मथ डालती होंगी। इन प्रमथनशील वृत्तियों को दमन करने से भी किन्तु तंत्र के इस प्रशस्त व्युत्पत्तिपरक अर्थ के साथ ही 'तंत्र' शब्द का एक दबते न देख, अवश्य ही साधकों ने उन्हें समूल नष्ट करने के लिए संयम प्रचलित रूढार्थ भी है, जिसमें सांसारिक आकांक्षाओं और विषय-वासनाओं की जागरूक अवस्था में थोड़ा अवसर दिया कि वे भोग का भी रस ले लें, की पूर्ति के लिए मद्य, मांस, मैथुन आदि पंच मकारों का सेवन करते हुए ताकि उनका सर्वथा शमन हो जाये और वासनारूप से वे हृदय के भीतर यन्त्र, मंत्र, पूजा, जप, होम, बलि अदि के द्वारा मारण, मोहन, वशीकरण, न रह सकें। अनंगवज्र ने कहा है कि चित्तक्षुब्ध होने से कभी भी सिद्धि नहीं उच्चाटन, स्तम्भन, विद्वेषण आदि षट्कर्मों की सिद्धि के लिए देवी- हो सकती, अत: इस तरह बरतना चाहिए जिसमें मानसिक क्षोभ उत्पन्न ही देवताओं की उपासना की जाती है और उन्हें प्रसन्न करके अपने अधीन न हो - किया जाता है। वस्तुत: इस प्रकार की साधना का लक्ष्य व्यक्ति की लौकिक तथा तथा प्रवर्तेत यथा न क्षुभ्यते मनः। वासनाओं और वैयक्तिक स्वार्थों की सिद्धि ही होता है। अपने इस प्रचलित संक्षुब्धे चित्तरत्ने तु सिद्धिर्नैव कदाचन । रूढार्थ में तंत्र को एक निकृष्ट कोटि की साधना- पद्धति समझा जाता है। जब तक चित्त में कामभोगोपलिप्सा है, तब तक चित्त में क्षोभ का इस कोटि की तान्त्रिक साधना बहुप्रचलित रही है, जिससे हिन्दू, बौद्ध और उत्पन्न होना स्वाभाविक है। इस प्रकार हम देखते हैं कि न केवल हिन्दू जैन-तीनों ही साधना-विधियों पर उसका प्रभाव भी पड़ा है। फिर भी तांत्रिक साधनाओं में अपितु बौद्ध तांत्रिक साधना में भी किसी न किसी रूप सिद्धान्तत: ऐसी तान्त्रिक साधना जैनों को कभी मान्य नहीं रही, क्योंकि वह में भोगवादी जीवनदृष्टि का समर्थन हुआ है। यद्यपि परवर्तीकाल में विकसित उसकी निवृत्तिप्रधान जीवन दृष्टि और अहिंसा के सिद्धान्त के प्रतिकूल थी। बौद्धों की यह भोगमूलक जीवनदृष्टि भारत में उनके अस्तित्व को ही समाप्त यद्यपि ये निकृष्ट साधनाएं तन्त्र के सम्बन्ध में एक भ्रान्त अवधारणा ही है, कर देने का कारण बनी, क्योंकि इस भोगमूलक जीवनदृष्टि को अपना लेने फिर भी सामान्यजन तन्त्र के सम्बन्ध में इसी धारणा का शिकार रहा हैं। पर बौद्ध और हिन्दू परम्परा का अन्तर समाप्त हो गया। दूसरे इसके परिणाम सामान्यतया जनसाधारण में प्राचीन काल से ही तान्त्रिक साधनाओं का यही स्वरूप बौद्ध भिक्षुओं में भी एक चारित्रिक पतन आया। फलत: उनके प्रति रूप अधिक प्रचलित रहा है। ऐतिहासिक एवं साहित्यिक साक्ष्य भी तन्त्र के जन-साधारण की आस्था समाप्त हो गयी और बौद्ध धर्म की अपनी कोई इसी स्वरूप का समर्थन करते हैं। विशिष्टता नहीं बची, फलतः वह अपनी जन्मभूमि से समाप्त हो गया। भोगमूलक जीवनदृष्टि और वासनोन्मुख तन्त्र की इस जीवनदृष्टि के समर्थन में भी बहुत कुछ कहा गया है। कुलार्णव में कहा गया है कि जैन धर्म में तन्त्र की भोगमूलक जीवनदृष्टि का निषेध सामान्यतया जिन वस्तुओं के उपयोग को पतन का कारण माना जाता है तन्त्र की इस भोगवादी जीवनदृष्टि के प्रति जैन आचार्यों का उन्हें कौलतन्त्र में महात्मा भैरव ने सिद्धि का साधन बताया है। इसी प्रकार दृष्टिकोण सदैव निषेधपरक ही रहा है। वैयक्तिक भौतिक हितों एवं वासनाओं न केवल हिन्दू तांत्रिक साधना में अपितु बौद्ध परम्परा में भी प्रारम्भ से ही की पूर्ति के निमित्त धन, सम्पत्ति, सन्तान आदि की प्राप्ति हेतु अथवा कठोर साधनाओं के द्वारा आत्मपीड़न की प्रवृत्तियों को उचित नहीं माना कामवासना की पूर्ति हेतु अथवा शत्रु के विनाश के लिए की जाने वाली गया। भगवान् बुद्ध ने मध्यममार्ग के रूप में जैविक मूल्यों की पूर्ति हेतु साधनाओं के निर्देश तो जैन आगमों में उपलब्ध हो जाते हैं, जिससे यह भोगमय जीवन का भी जो आंशिक समर्थन किया था, वही आगे चलकर सिद्ध होता है कि इस प्रकार की तांत्रिक साधनाएं प्राचीन काल में भी बौद्ध धर्म में वज्रयान के रूप में तांत्रिक भोगमूलक जीवनदृष्टि के विकास का प्रचलित थीं, किन्तु प्राचीन जैन आचार्यों ने इसे सदैव हेय दृष्टि से देखा था कारण बना और उसमें भी निवृत्तिमय जीवन के प्रति विरोध के स्वर मुखरित और साधक के लिए ऐसी तांत्रिक साधनाओं का सर्वथा निषेध किया था। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.211103
Book TitleTantrasadhna aur Jain Jivan Drushti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSagarmal Jain
PublisherZ_Shwetambar_Sthanakvasi_Jain_Sabha_Hirak_Jayanti_Granth_012052.pdf
Publication Year1998
Total Pages4
LanguageHindi
ClassificationArticle & Mantra Tantra
File Size950 KB
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