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________________ - यतीन्द्रसूरि स्मारकग्रन्थ - जैन दर्शन - सकती, जिस प्रकार धर्म के बिना गति नहीं हो सकती। चलता कि कर्मवाद में कहीं पर व्यक्ति को अपनी स्वतंत्रता के उपयोग हुआ पथिक छाया देखकर विश्राम करने लगता है। छाया पथिक का भी अवसर मिलता है अथवा वह मशीन की तरह पूर्व कर्मों को बुलाती नहीं है फिर भी छाया देखकर पथिक विश्राम करता है। के फल को भोगता हुआ तथा नए कर्मबंधों को प्राप्त करता इसलिए यहाँ छाया स्थिति का या अगति का कारण बनती है। हुआ गतिशील रहता है। यदि प्राणी को कहीं कोई स्वतंत्रता न हो और वह मशीन की तरह ही कर्म के द्वारा चालित हो तब तो आकाश- अवगाह या अवकाश देने वाला तत्त्व आकाश कहलाता है। इसमें जीव, पुदगल, धर्म, अधर्म तथा काल कर्मवाद और नियतिवाद तथा पुरुषवाद में अन्तर क्या होगा? आश्रय पाते हैं। आकाश का काम अन्य सभी को आश्रय देना किन्तु इच्छा-स्वातंत्र्य का जिस रूप में निरूपण जैन परंपरा में है। इसके दो भाग हैं--लोकाकाश तथा अलोकाकाश। आकाश हुआ वह इस प्रकार है-- के जिस भाग में धर्म-अधर्म तथा पुण्य एवं पाप के फल होते हैं, (१) किए गए कमों का फल कर्ता को भोगना पड़ता है। उसे लोकाकाश कहते हैं और जिस भाग में धर्म-अधर्म तथा (२) पर्वकत कर्मो के फल को वह शीघ्र या देर से भोग सकता है। पुण्य एवं पाप के फल नहीं होते उसे अलोकाकाश कहते हैं। (३) बाह्य परिस्थितियों एवं अपनी आन्तरिक शक्ति को ध्यान पुद्गल - अन्य दर्शन जिसे भौतिक तत्त्व के नाम से में रखते हुए प्राणी नये कर्मों का उपार्जन रोक सकता है। पुकारते हैं, बौद्ध दर्शन जिसका प्रयोग चैत्तसिक सत्ता के लिए (४) किन्तु ऐसा भी नहीं है कि प्राणी के मन में जो आए वही करता है, वह जैन दर्शन में पुद्गल कहलाता है। इसके चार धर्म करे। इन बातों से ऐसा लगता है कि कर्मवाद में इच्छा होते हैं--स्पर्श, रस, गन्ध और वर्ण। स्वातांत्र्य तो है, किन्तु सीमित है। नियतिवाद में बँधे हुए स्पर्श के आठ प्रकार होते हैं -मृदु, कठिन, गुरु, लघु, शीत, उष्ण, व्यक्ति की तरह कर्मवादी पूर्णरूपेण परतन्त्र नहीं होता। स्निग्ध तथा रूक्षा कर्म का स्वरूप रस के पाँच प्रकार होते हैं--तिक्त, कटु, अम्ल, मधुर और कषाय। जैन परंपरा में कर्म को पुद्गल परमाणुओं का पिण्ड माना गन्ध के दो प्रकार होते हैं--सुरभिगन्ध तथा दुरभिगन्ध। गया है। आचारांग सूत्र में आया है कि कर्म वह है जिसके कारण वर्ण के पाँच प्रकार होते हैं--नील, पीत, शक्ल, कृष्ण तथा लोहित। साधन तुल्य होने पर भी फल का तारतम्य अथवा अन्तर मानव जगत् में दृष्टिगत होता है। उस तारतम्य अथवा विविधता के काल - परिवर्तन का जो कारण हो वह अद्धासमय या कारण का नाम कर्म है। प्रत्येक प्राणी का सुख-दुःख तथा काल कहलाता है। तत्त्वार्थराजवर्तिक में काल की व्याख्या दो तत्सम्बन्धी अन्यान्य अवस्थाएँ उसके कर्म की विचित्रता एवं दृष्टियों से की गई है-- व्यवहार की दृष्टि से एवं परमार्थ की दृष्टि विविधता पर आधारित होती है। सम्पूर्ण लोक कर्मवर्गणा तथा से। प्रत्येक द्रव्य परिवर्तित होता रहता है। परिवर्तनों के होते हुए नो कर्मवर्गणा इन दोनों प्रकार के परमाणुओं से पूर्ण है। जीव भी उसकी जाति का विनाश नहीं होता। इस प्रकार के परिवर्तन अपने मन वचन और काय की प्रवृत्तियों से इन परमाणुओं को परिणाम कहलाते हैं। इन परिणामों का जो कारण है, वह काल है। ग्रहण करता रहता है। मन, वचन और काय की प्रवृत्तियाँ तभी यह व्यावहारिक दृष्टि से काल की व्याख्या है। इसी प्रकार प्रत्येक होती है जब जीव के साथ कर्म संबद्ध हो तथा जीव के साथ द्रव्य और पर्याय की प्रतिक्षण भावी स्वसत्तानुभूति वर्तना है। इस कर्म तभी संबद्ध होता है जब मन, वचन और काय की प्रवृत्ति वर्तना का कारण काल है। यह काल की पारमार्थिक व्याख्या है। होती है। इस प्रकार प्रवृत्ति से कर्म और कर्म से प्रवृत्ति की कर्मसिद्धान्त परंपरा अनादिकाल से चली आ रही है। कर्म और प्रवृत्ति के इस कार्य-कारणभाव को दृष्टि में रखते हुए पुद्गल परमाणुओं के । कर्मवाद का एक सामान्य नियम है--पूर्वकृत कर्मों के पिण्ड रूप कर्म को द्रव्यकर्म तथा राग - द्वेषादि रूप प्रवृत्तियों फल को भोगना तथा नए कर्मों का उपार्जन करना। इसी परंपरा को भावकर्म कहा गया है। द्रव्यकर्म और भावकर्म का कार्यमें बँधा हुआ प्राणी जीवन व्यतीत करता है। किन्तु प्रश्न उठता है कारणभाव मुर्गी और अण्डे के समान अनादि है। roinూరగారసాగరసారంగపారmod 4 Jabarimantram Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.211036
Book TitleJainyoga ka Tattvamimansiya Adhar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudha Jain
PublisherZ_Yatindrasuri_Diksha_Shatabdi_Smarak_Granth_012036.pdf
Publication Year1999
Total Pages8
LanguageHindi
ClassificationArticle & Yoga
File Size983 KB
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