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डा. हुकमचन्द भारिल्ल
जैन दर्शन का तात्त्विक पक्ष वस्तु स्वातन्त्र्य
जैन दर्शन में वस्तु के जिस अनेकान्तात्मक स्वरूप का प्रतिपादन किया गया है, उसमें वस्तुस्वातन्त्र्य को सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है । उसमें मात्र जन-जन की स्वतन्त्रता की ही चर्चा नहीं, अपितु प्रत्येक द्रव्य की पूर्ण स्वतन्त्रता का सतर्क व सशक्त प्रतिपादन हुआ है । उसमें 'स्वतन्त्र होना है' की चर्चा नहीं 'स्वतन्त्र है' की घोषणा की गई है। 'होना है' में स्वतन्त्रता की नहीं, परतन्त्रता की स्वीकृति है, 'होना है' अर्थात् नहीं है । जो है उसे क्या होना ? स्वभाव से प्रत्येक वस्तु स्वतन्त्र ही है। जहां होना है की चर्चा है, वह पर्याय की चर्चा है। जिसे स्वभाव की स्वतन्त्रता समझ में आती है, पकड़ में आती है, अनुभव में आती है, उसकी पर्याय में स्वतन्त्रता प्रकट होती है अर्थात् उसको स्वतन्त्र पर्याय प्रकट होती है ।
: पर्याय भी परतन्त्र नहीं है । स्वभाव की स्वतन्त्रता वस्तुतः की अजानकारी ही पर्याय की परतन्त्रता है । पर्याय के विकार का कारण 'मैं परतन्त्र हूँ' ऐसी मान्यता है, न कि परपदार्थ । स्वभागपर्याय को तो परतन्त्र कोई नहीं मानता पर विकारी - पर्याय को परतन्त्र कहा जाता है। उसकी परतन्त्रता का अर्थ मात्र इतना है कि वह परलक्ष्य से उत्पन्न हुई है। पर के कारण किसी द्रव्य की कोई पर्याय उत्पन्न नहीं होती ।
विश्व का प्रत्येक पदार्थ पूर्ण स्वतन्त्र एवं परिणमनशील है, वह अपने परिणमन का कर्ताधर्ता स्वयं है, उसके परिणमन में पर का हस्तक्षेप रंचमात्र भी नहीं है। यहाँ तक कि परमेश्वर (भगवान) भी उसकी सत्ता एवं परिणमन का कर्ता हर्ता नहीं है। दूसरों के परिणमन अर्थात् कार्य में हस्तक्षेप की भावना ही मिथ्या, निष्फल और दुख का कारण है। क्योंकि सब जीवों के जीवन-मरण, सुख-दुख स्वयंकृत कर्म के फल हैं। एक दूसरे को एक दूसरे के दुःख-सुख और जीवन मरण को कर्ता मानना अज्ञान है ।
बी. नि. सं. २५०३
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कहा है
सर्वं सदैव नियतं भवति स्वकीयकमोंदयामरण जीवित दुःख सोयम् । अज्ञानमेतदिहं यत्तुः परः परस्य, कुर्यात्युमान्मरण जीवित दुःख सौख्यम् ॥
यदि एक प्राणी को दूसरे के दुःख सुख और जीवन-मरण को कर्त्ता माना जाए तो फिर स्वयंकृत शुभाशुभ कर्म निष्फल साबित होंगे। क्योंकि प्रश्न यह है कि हम बुरे कर्म करें और कोई दूसरा व्यक्ति यदि वह कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, क्या वह हमें सुखी कर सकता है? इसी प्रकार हम अच्छे कार्य करें और कोई व्यक्ति, यदि वह ईश्वर ही क्यों न हो, क्या हमारा बुरा कर सकता है ? यदि हाँ, तो फिर अच्छे कार्य करना और बुरे कार्यों से डरना व्यर्थ है क्योंकि उनके फल को भोगना तो आवश्यक है नहीं ? और यदि यह सही है कि हमें अपने अच्छे बुरे कर्मों का फल भोगना ही पड़ेगा तो फिर पर के हस्तक्षेप की कल्पना निरर्थक है। इसी बात को अमितगति आचार्य ने इस प्रकार व्यक्त किया है
स्वयं कृतः कर्मयदात्मनापुरा, फलं सदीयं लभते शुभाशुभं । परेण दत्तं यदि लभ्यते स्फू स्वयं कृतं निरर्थकं तदा ।। निज कर्म विहाय देहिनो, न कोपि कस्यापि ददाति किंचन । विचारयन्नेव मनन्य मानसः, परो ददातीति विमुचय मां ॥
१. आचार्य अमृतचन्द्र ( समयसार कलश १६८ )
२. भावना द्वात्रिंशतिका ( सामायिक पाठ) छन्द ३०-३१
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