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________________ जालनाा जैन कर्मसिद्धान्त : एक विश्लेषण 211 और 8. अन्तराय। प्रकार जो कर्मवर्गणाएँ आत्मा की दर्शन-शक्ति में बाधक होती हैं, वे दर्शनावरणीय कर्म कहलाती हैं। ज्ञान से पहले होने वाला वस्तु-तत्त्व 1. ज्ञानावरणीय कर्म का निर्विशेष (निर्विकल्प) बोध, जिसमें सत्ता के अतिरिक्त किसी जिस प्रकार बादल सूर्य के प्रकाश को ढंक देते हैं, उसी विशेष गुण धर्म की प्राप्ति नहीं होती, दर्शन कहलाता है। दर्शनावरणीय प्रकार जो कर्मवर्गणाएँ आत्मा की ज्ञानशक्ति को ढंक देती हैं और ज्ञान कर्म आत्मा के दर्शन-गुण को आवृत करता है। की प्राप्ति में बाधक बनती हैं, वे ज्ञानावरणीय कर्म कही जाती हैं। दर्शनावरणीय कर्म के बन्य के कारण-ज्ञानावरणीय कर्म के समान ज्ञानावरणीय कर्म के बन्धन के कारण-जिन कारणों से ज्ञानावरणीय ही छ: प्रकार के अशुभ आचरण के द्वारा दर्शनावरणीय कर्म का बन्ध कर्म के परमाणु आत्मा से संयोजित होकर ज्ञान-शक्ति को कुंठित करते होता है- (1) सम्यक् दृष्टि की निन्दा (छिद्रान्वेषण) करना अथवा हैं, वे छ: हैं उसके प्रति अकृतज्ञ होना, (2) मिथ्यात्व या असत् मान्यताओं का 1. प्रदोष- ज्ञानी का अवर्णवाद (निन्दा) करना एवं उसके अवगुण प्रतिपादन करना, (3) शुद्ध दृष्टिकोण की उपलब्धि में बाधक बनना, निकालना। (4) सम्यग्दृष्टि का समुचित विनय एवं सम्मान नहीं करना, (5) 2. निह्नव-ज्ञानी का उपकार स्वीकार न करना अथवा किसी विषय सम्यग्दृष्टि पर द्वेष करना (6) सम्यग्दृष्टि के साथ मिथ्याग्रह सहित को जानते हुए भी उसका अपलाप करना। विवाद करना। 3. अन्तराय- ज्ञान की प्राप्ति में बाधक बनना, ज्ञानी एवं ज्ञान के दर्शनावरणीय कर्म का विपाक-उपर्युक्त अशुभ आचरण के कारण साधन पुस्तकादि को नष्ट करना। आत्मा का दर्शन गुण नौ प्रकार से कुंठित हो जाता है४. मात्सर्य- विद्वानों के प्रति द्वेष-बुद्धि रखना, ज्ञान के साधन (1) चक्षुदर्शनावरण- नेत्रशक्ति का अवरुद्ध हो जाना। पुस्तक आदि में अरुचि रखना। (2) अचक्षुदर्शनावरण-नेत्र के अतिरिक्त शेष इन्द्रियों की सामान्य 5. असादना- ज्ञान एवं ज्ञानी पुरुषों के कथनों को स्वीकार नहीं अनुभवशक्ति का अवरुद्ध हो जाना। करना, उनका समुचित विनय नहीं करना। (3) अवधिदर्शनावरण-सीमित अतीन्द्रिय दर्शन की उपलब्धि में 6. उपघात- विद्वानों के साथ मिथ्याग्रह युक्त विसंवाद करना अथवा बाधा उपस्थित होना। स्वार्थवश सत्य को असत्य सिद्ध करने का प्रयत्न करना। (4) केवल दर्शनावरण-परिपूर्ण दर्शन की उपलब्धि का नहीं होना। उपर्युक्त छ: प्रकार का अनैतिक आचरण व्यक्ति की ज्ञानशक्ति (5) निद्रा- सामान्य निद्रा। के कुंठित होने का कारण है। (6) निद्रानिद्रा- गहरी निद्रा। ज्ञानावरणीय कर्म का विपाक-विपाक की दृष्टि से ज्ञानावरणीय (7) प्रचला-बैठे-बैठे आ जाने वाली निद्रा। कर्म के कारण पाँच रूपों में आत्मा की ज्ञान-शक्ति का आवरण (8) प्रचला-प्रचला-चलते-फिरते भी आ जाने वाली निद्रा। होता है (9) स्त्यानगृद्धि-जिस निद्रा में प्राणी बड़े-बड़े बल-साध्य कार्य कर (1) मतिज्ञानावरण- ऐन्द्रिक एवं मानसिक ज्ञान-क्षमता का अभाव, डालता है। (2) श्रुतज्ञानावरण- बौद्धिक अथवा आगमज्ञान की अनुपलब्धि, अन्तिम दो अवस्थाएँ आधुनिक मनोविज्ञान के द्विविध (3) अवधि ज्ञानावरण- अतीन्द्रिय ज्ञान-क्षमता का अभाव व्यक्तित्व के समान मानी जा सकती हैं। उपर्युक्त पाँच प्रकार की (4) मनःपर्याय ज्ञानावरण-दूसरे की मानसिक अवस्थाओं का ज्ञान निद्राओं के कारण व्यक्ति की सहज अनुभूति की क्षमता में अवरोध प्राप्त करने लेने की शक्ति का अभाव उत्पन्न हो जाता है। (5) केवलज्ञानावरण-पूर्णज्ञान प्राप्त करने की क्षमता का अभाव। कहीं-कहीं विपाक की दृष्टि से इसके 10 भेद भी बताये गये 3. वेदनीय कर्म हैं-१. सुनने की शक्ति का अभाव, 2. सुनने से प्राप्त होने वाले ज्ञान जिसके कारण सांसारिक सुख-दुःख की संवेदना होती है, को अनुपलब्धि, 3. दृष्टि शक्ति का अभाव, 4. दृश्यज्ञान की अनुपलब्धि, उसे वेदनीय कर्म कहते हैं। इसके दो भेद हैं- 1. सातावेदनीय 4. गंधग्रहण करने की शक्ति का अभाव, 6. गन्ध सम्बन्धी ज्ञान की और 2. असातावेदनीय। सुख रूप संवेदना का कारण सातावेदनीय अनुपलब्धि, 7. स्वाद ग्रहण करने की शक्ति का अभाव, 8. स्वाद और दुःख रूप संवेदना का कारण असातावेदनीय कर्म कहलाता है। सम्बन्धी ज्ञान की अनुपलब्धि, 9. स्पर्श-क्षमता का अभाव और 10. सातावेदनीय कर्म के कारण- दस प्रकार का शुभाचरण करने स्पर्श सम्बन्धी ज्ञान की अनुपलब्धि। वाला व्यक्ति सुखद-संवदेना रूप सातावेदनीय कर्म का बन्ध करता है- (1) पृथ्वी, पानी आदि के जीवों पर अनुकम्पा करना। (2) 2. दर्शनावरणीय कर्म वनस्पति, वृक्ष, लतादि पर अनुकम्पा करना। (3) द्वीन्द्रिय आदि जिस प्रकार द्वारपाल राजा के दर्शन में बाधक होता है, उसी प्राणियों पर दया करना। (4) पंचेन्द्रिय पशुओं एवं मनुष्यों पर Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210616
Book TitleJain Karm Siddhant Ek Vishleshan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSagarmal Jain
PublisherZ_Shwetambar_Sthanakvasi_Jain_Sabha_Hirak_Jayanti_Granth_012052.pdf
Publication Year1998
Total Pages8
LanguageHindi
ClassificationArticle & Karma
File Size3 MB
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