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________________ 210 जैन विद्या के आयाम खण्ड-६ विस्तृत चर्चा भी उपलब्ध होती है। किन्तु सामान्य रूप से बन्धन के सामान्यतया लोभ (राग), द्वेष एवं मोह को बन्धन का कारण कहा गया 5 कारण माने गए हैं-१. मिथ्यात्व 2. अविरति 3. प्रमाद 4. है। बोद्ध परम्परा में भी इनको परस्पर सापेक्ष ही माना गया है। मोह को कषाय और 5. योग। बौद्ध परम्परा में अविद्या भी कहा गया है। बौद्ध विचारणा यह मानती .. इन पाँच कारणों में योग को अर्थात् मानसिक, वाचिक व है कि अविद्या (मोह) के कारण तृष्णा (राग) होती है और तृष्णा के शारीरिक क्रियाओं को बन्धन का कारण कहा गया है, किन्तु हमें स्मरण कारण मोह होता है। आचार्य नरेन्द्रदेव लिखते हैं- लोभ एवं द्वेष का रखना चाहिए कि यदि पूर्व के चार का अभाव हो, तो मात्र योग से हेतु मोह है, किन्तु पर्याय से लोभ व मोह भी द्वेष के हेतु हैं। बौद्ध कर्मवर्गणाओं का आस्रव होकर, जो बन्ध होगा, वह ईर्यापथिक बन्ध दर्शन में भी जैन दर्शन के समान ही अविद्या और तृष्णा को अन्योन्याश्रित कहलाता है। उसके सन्दर्भ में कहा गया है उसका प्रथम समय में बन्ध माना गया है और कहा गया है कि इनमें से किसी की भी पूर्व कोटि होता है और दूसरे समय में निर्जरा हो जाती है। ईर्यापथिक बन्ध ठीक निर्धारित करना सम्भव नहीं है। सांख्य एवं योग दर्शन में क्लेश या वैसा ही है, जैसे चलते समय शुभ्र आर्द्रता से रहित कपड़े पर गिरे हुए बन्धन के 5 कारण हैं--अविद्या, अस्मिता (अहंकार), राग, द्वेष, बालू के कण, जो गति की प्रक्रिया में ही आते हैं और फिर अलग भी अभिनिवेश। इनमें भी अविद्या प्रमुख है। शेष चारों उसी पर आधारित हो जाते हैं। वस्तुत: यह बन्ध वास्तविक बन्ध नहीं है। अत: हम समझते हैं। न्याय दर्शन भी जैन और बौद्धों के समान ही राग-द्वेष एवं मोह को हैं कि इन 5 कारणों में योग महत्त्वपूर्ण कारण नहीं है। यद्यपि अविरति, बन्धन का कारण मानता है। इस प्रकार लगभग सभी दर्शन प्रकारान्तर प्रमाद एवं कषाय को अलग-अलग कारण कहा गया है, किन्तु इनमें से राग-द्वेष एवं मोह (मिथ्यात्व) को बन्धन का कारण मानते हैं। भी बहुत अन्तर नहीं है। जब हम प्रमाद को व्यापक अर्थ में लेते हैं तब कषायों का अन्तर्भाव प्रमाद में हो जाता है। दूसरे कषायों की उपस्थिति बन्धन के चार प्रकारों से बन्धनों के कारण का सम्बन्ध५५ में ही प्रमाद सम्भव होता है। उनकी अनुपस्थिति में प्रमाद सामान्यतया जैन कर्म सिद्धान्त में बन्धन के चार प्रारूप कहे गए है:- 1. तो रहता ही नहीं है और यदि रहे भी तो अति निर्बल होता है। इसी प्रकृति बन्ध, 2. प्रदेश बन्ध, 3. स्थिति बन्ध, एवं 4. अनुभाग बन्ध। प्रकार अविरति के मूल में भी कषाय ही होते हैं। यदि हम कषाय को 1. प्रकृतिबन्ध-बन्धन के स्वभाव का निर्धारण प्रकृति बन्ध करता व्यापक अर्थ में लें तो अविरति और प्रमाद दोनों उसी में अन्तर्भावित है। यह, यह निश्चय करता है कि कर्मवर्गणा के पुद्गल आत्मा की ज्ञान, हो जाते हैं। अत: बन्धन के दो ही प्रमुख कारण शेष रहते हैं- दर्शन आदि किस शक्ति को आवृत करेंगे। मिथ्यात्व और कषाय। 2. प्रदेश बन्ध- यह कर्मपरमाणुओं की आत्मा के साथ संयोजित मिथ्यात्व एवं कषाय में कौन प्रमुख कारण है, यह वर्तमान होने वाली मात्रा का निर्धारण करता है। अत: यह मात्रात्मक होता है। युग में एक बहुचर्चित विषय है। इस सन्दर्भ में पक्ष व प्रतिपक्ष में 3. स्थितिबन्ध-कर्मपरमाणु कितने समय तक आत्मा से संयोजित पर्याप्त लेख लिखे गये हैं। आचार्य विद्यासागरजी एवं उनके समर्थक रहेंगे और कब निर्जरित होंगे, इस काल-मर्यादा का निश्चय स्थिति-बन्ध विद्वत् वर्ग का कहना है कि मिथ्यात्व अकिंचितकर है और कषाय ही करता है। अत: यह बन्धन की समय-मर्यादा का सूचक है। बन्धन का प्रमुख कारण है, क्योंकि कषाय की उपस्थिति के कारण ही 4. अनुभागबन्ध- कर्मों के बन्धन और विपाक की तीव्रता एवं मिथ्यात्व होता है। कानजीस्वामी समर्थक दूसरे वर्ग का कहना है कि मन्दता का निश्चय करना, यह अनुभाग बन्ध का कार्य है। दूसरे शब्दों मिथ्यात्व ही बन्धन का प्रमुख कारण है। वस्तुत: यह विवाद अपने- में यह बन्धन की तीव्रता या गहनता का सूचक है। अपने एकांगी दृष्टिकोणों के कारण है। कषाय और मिथ्यात्व ये दोनों उपरोक्त चार प्रकार के बन्धनों में प्रकृति बन्ध एवं प्रदेश बन्ध ही अन्योन्याश्रित हैं। कषाय के अभाव में मिथ्यात्व की सत्ता नहीं रहती का सम्बन्ध मुख्यतया योग अर्थात् कायिक, वाचिक एवं मानसिक और न मिथ्यात्व के अभाव में कषाय ही रहते हैं। मिथ्यात्व तभी समाप्त क्रियाओं से है, जबकि बन्धन की तीव्रता (अनुभाग) एवं समयावधि होता है, जब अनन्तानुबन्धी कषायें समाप्त होती हैं और कषायें भी तभी (स्थिति) का निश्चय कर्म के पीछे रही हुई कषाय-वृत्ति और मिथ्यात्व समाप्त होती हैं, जब मिथ्यात्व का प्रहाण होता है। वे ताप और प्रकाश पर आधारित होता है। संक्षेप में योग का सम्बन्ध प्रदेश एवं प्रकृति बन्ध के समान सहजीवी हैं। इनमें एक के अभाव में दूसरे की सत्ता क्षीण होने से है, जबकि कषाय का सम्बन्ध स्थिति एवं अनुभाग बन्ध से है। लगती है। वैसे मिथ्यात्व, अज्ञान एवं मोह का पर्यायवाची है। आवेगों अर्थात् कषायों की उपस्थिति में ही मोह या मिथ्यात्व सम्भव होता है। आठ प्रकार के कर्म और उनके बन्धन के कारण५६ वास्तविकता यह है कि मोह (मिथ्यात्व) से कषाय उत्पन्न होते हैं और जिस रूप में कर्मपरमाणु आत्मा की विभिन्न शक्तियों के कषायों के कारण ही मोह (मिथ्यात्व) होता है। अतः कषाय और प्रकटन का अवरोध करते हैं और आत्मा का शरीर से सम्बन्ध मिथात्व अन्योन्याश्रित हैं और बीज एवं वृक्ष की भाँति इनमें से किसी स्थापित करते हैं-- उनके अनुसार उनके विभाग किये जाते हैं। की पूर्व कोटि निर्धारित नहीं की जा सकती है। ___ जैनदर्शन के अनुसार कर्म आठ प्रकार के हैं --1. ज्ञानावरणीय 2. यदि हम इसी प्रश्न पर बौद्ध दृष्टि से विचार करें तो उसमें दर्शनावरणीय 3. वेदनीय 4. मोहनीय 5. आयुष्य 6. नाम 7. गोत्र Jain Education 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SR No.210616
Book TitleJain Karm Siddhant Ek Vishleshan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSagarmal Jain
PublisherZ_Shwetambar_Sthanakvasi_Jain_Sabha_Hirak_Jayanti_Granth_012052.pdf
Publication Year1998
Total Pages8
LanguageHindi
ClassificationArticle & Karma
File Size3 MB
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