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________________ જૈન આગમધર ઔર પ્રાકૃત વાય [39 जो मान्यता चलती है और जिसका विस्तृत वर्णन तित्थोगालियपइण्णयमें पाया भी जाता है, इस विषयमें “ अणागतमढे ण णिद्धारेज-जधा ककी अमुको वा एवंगुणो राया भविस्सइ" ऐसा लिखकर कल्किविषयक मान्यताको आदर नहीं दिया है. इस चूर्णिमें “ भणितं च वररुचिणा-अंबं फलाणं मम दालिमं पियं' [पृ० १७३] इस प्रकार वररुचिके कोई प्राकृत ग्रंथका उद्धरण मिल सकता है. वररुचिका यह प्राकृत उद्धरण प्राकृतव्याकरणप्रणेता वररुचिके समयनिर्णयके लिए उपयुक्त होनेकी सम्भावना है. इस चूर्णिकी प्रति जैसलमेरके जिनभद्रीय ज्ञानभण्डारमें सुरक्षित है. इसका प्रकाशन प्राकृत टेकस्ट सोसायटोकी ओरसे मेरे द्वारा सम्पादित हो कर शीघ्र ही प्रकाशित होगा. (३१) संघदासगणि क्षमाश्रमण (वि० ५वीं शताब्दी)-ये आचार्य वसुदेवहिंडी - प्रथम खण्डके प्रणेता संघदासगणि वाचकसे भिन्न हैं एवं इनके बाद के भी हैं. इन्होंने कल्पलघुभाष्य और पंचकल्पमहाभाष्यकी रचना की है. वे महाभाष्यकार जिनभद्रगणि क्षमाश्रमणके पूर्ववर्ती हैं. (३२) जिनभद्रगणि क्षमाश्रमण (वि० की छठी शती)- ये सैद्धान्तिक आचार्य थे. इनकी महाभाष्यकार एवं भाष्यकारके रूपमें प्रसिद्धि है. दार्शनिक-गम्भीरचिन्तनपरिपूर्ण विशेषावश्यक महाभाष्यको रचनाने इन्हें बहुत प्रसिद्ध किया है. केवलज्ञान और केवलदर्शन विषयक युगपदुपयोगद्वयवाद एवं अभेदवादको माननेवाले तार्किक आचार्य सिद्धसेन दिवाकर और मल्लवादीके मतका इन्होंने उपर्युक्त भाष्य एवं विशेषणवत। ग्रन्थमें निरसन किया है. जीत कल्पसूत्र, बृहत्संग्रहगी, बृहत्क्षेत्रसमास, अनुयोगद्वारचूर्णिगत अंगुलपदचूर्णि और विशेषावश्यक-स्वोपज्ञवृत्ति-षष्ठगणधरवाद व्याख्यानपर्यन्त--इनके इतने ग्रन्थ आज उपलब्ध हैं. (३३) कोट्टायवादिगणी क्षमाश्रमण (वि० ५४०के बाद)- इन आचार्यने जिनभद्रगणिकी स्वोपज्ञ वृत्तिकी अपूर्ण रचनाको पूर्ण किया है. इन्होंने अनुसन्धित अपनी इस वृत्तिमें यह सूचित किया है " निर्माप्य षष्ठगणधर-व्याख्यानं किल दिवंगता पूज्याः" अर्थात् छठे गणधरवादका व्याख्यान करके पूज्य जिनभद्रगणी स्वर्गवासी हुए. आगेकी वृत्तिका अनुसन्धान इन्होंने किया है. इस रचनाके अतिरिक्त इनकी अन्य कोई रचना नहीं मिली है. यह स्वोपज्ञवृत्ति ला० द० विद्यामन्दिर, अहमदाबादकी ओरसे प्रकाशित होगी. (३४) सिद्धसेनगणि क्षमाश्रमण (वि० छठी शती)--इनकी आज कोई स्वतन्त्र रचना प्राप्त नहीं है. इनके रचे हुए कुछ सन्दर्भ, जो नियुक्ति, भाष्य आदिके व्याख्यानरूप गाथासन्दर्भ हैं, निशीथचूर्णि व आवश्यकचूर्णिमें मिलते हैं. निशीथचूर्णिमें इनका नाम एवं गाथाएँ छः जगह उल्लिखित हैं, जिनके भद्रबाहुकृत नियुक्तिगाथाओं तथा पुरातनगाथाओंके व्याख्यानरूप होनेका निर्देश है. आवश्यकचूर्णिमें (विभाग २, पत्र २३३) इनके नामके साथ दो व्याख्यान-गाथाएँ दी गई हैं. पंचकल्पचूर्णिमें भी “ उक्तं च सिद्धसेनक्षमाश्रमणगुरुभिः" ऐसा लिख कर इनकी एक गाथाका Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210571
Book TitleJain Agamdhar aur Prakrit Vangamaya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPunyavijay
PublisherPunyavijayji
Publication Year1969
Total Pages42
LanguageHindi
ClassificationArticle & Ascetics
File Size3 MB
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