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________________ 3] જ્ઞાનાંજલિ सोमास्वातिवाचकविरचिततत्त्वार्थोपरि अशीतिसहस्रश्लोकप्रमाणं महाभाष्यं रचितम् । एकादशाङ्गोपरि चार्यस्कन्दिलस्थविराणामुपरोधतस्तैविवरणानि रचितानि । यदुक्तं तदचिताऽऽचारागविवरणान्ते थेरस्स महु मित्तस्स सेहेहिं तिपुचनाणजुत्तेहिं । मुणिगणविदिएहि वधगयरागाइदोसेहिं ॥ बंभद्दीवियसाहामउडेहिं गन्धहत्थिविबुहेहिं ।। विवरणमेयं रहयं दोसयवासेसु विक्कमओ ॥" हिमवंतस्थविरावलिके इस अंशमें आचार्य गन्धहस्तिको तत्त्वार्थगन्धहस्तिमहाभाष्यके प्रणेता एवं ग्यारह जैन अंग आगमोंके विवरणकार बतलाया है, जबकि आचार्य शलांकने इन्हें केवल आचाराङ्गके प्रथम अध्ययनके रचयिता ही कहा है. दूसरी बात यह है कि इनकी ग्यारह अंगकी वृत्तियोंके उद्धरण या नामोल्लेख भाष्य-चूर्णि-वृत्तियोंमें कहीं भी दिखाई नहीं देते. ऐसी स्थितिमें पट्टावलिके इस उल्लेखको कहां तक माना जाय, यह एक प्रश्न है. यहां पर गन्वहस्ती, यह विशेषनाम है, विशेषण नहीं. शीलांकाचार्यनिर्दिष्ट गन्धहस्ती हिमवंतस्थविरावलिनिर्दिष्ट गन्धहस्ती ही हैं या अन्य, इसका निर्णय करना कठिन है. स्थविरावलिमें जो आचारांगविवरणकी अंतिम प्रशस्तिका उद्धरण दिया गया है वह कहां तक ठीक है, यह कहना भी जरा कठिन है. इस विशेषनामके साथ रहे हुए गौरवको देखकर ही बादमें इस नामका उपयोग विशेषणके रूपमें होने लगा. तत्त्वार्थसूत्रवृत्तिके प्रणेता सिद्धसेनाचार्य ‘गन्धहस्ति' कहे जाते थे. ये हिमवंतस्थविरावलि द्वारा निर्दिष्ट गन्धहस्तीसे अन्य ही हैं। क्योंकि इनका समय विक्रम आठवीं शतीके बादका है, जब कि स्थविरावलिनिर्दिष्ट गन्धहस्तिका समय विक्रम २०० है. श्री यशोविजयजी उपाध्यायने अपनी गुरुतत्त्वविनिश्चयकी स्वोपज्ञ वृत्तिमें सन्मतितर्कके प्रणेता सिद्धसेनाचार्यको भी 'गन्धहस्ती' लिखा है. (२७-२८) मित्तवायग-खमासमण व साधुरक्षितगणि क्षमाश्रमण - इन दोनों स्थविरोंकी मान्यता एवं नामका उल्लेख व्यवहारभाष्य गा० ४९२की चूर्णिमें चूर्णिकारने किया है. (२९) धम्मगणि खमासमण-इन क्षमाश्रमणके मंतव्यका उल्लेख कल्पविशेषचूर्णिमें " अहवा धम्मगणिखमासमणादेसेणं सव्वेसु वि पदेसु इमा सोही-थेराईसुं अहवा० गाहाद्वयम्" इस प्रकार है. (३०) अगस्त्यसिंह (भाष्यकारोंके पूर्व)- ये स्थविर आर्य वज्रकी शाखामें हुए हैं. इन्होंने दशवकालिकसूत्र पर चूर्णिकी रचना की है. यह चूर्णि दशवैकालिकसूत्रके विविध पाठभेद एवं भाषाको दृष्टि से बहुत महत्त्वकी है. इस चूर्णिमें भाष्यकारकी गाथाओंका उल्लेख न होनेसे इनकी रचना भाष्यकारोंके पूर्वकी प्रतीत होती है. इसमें कई उल्लेख ऐसे भी हैं जो चालू साम्प्रदायिक प्रणालीसे भिन्न प्रकारके हैं. आचार्य श्री हरिभद्रने अपनी वृत्तिमें कहीं भी इस चूर्णिका उल्लेख नहीं किया है, इसका कारण यही प्रतीत होता है. विद्वानोंकी भी ज्ञातियां होती हैं. इसमें कल्किविषयक Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210571
Book TitleJain Agamdhar aur Prakrit Vangamaya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPunyavijay
PublisherPunyavijayji
Publication Year1969
Total Pages42
LanguageHindi
ClassificationArticle & Ascetics
File Size3 MB
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