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________________ 30 1 वालब्भ संघकज्जे उजमियं जुगपद्दाणतुल्लेहिं । गंधवाहवे याल संतिसूरीहिं वलहीप ॥ इस प्रकारका प्राचीन उल्लेख भी पाया जाता है. इस गाथामें 'बलभीमें वालभ्यसंघके कार्य के लिए गन्धर्व वादिवेताल शान्तिसूरिने प्रयत्न किया था ऐसा जो उल्लेख है वह वालभ्यसंघ कार्य वालभीवाचनाको लक्ष्य करके ही अधिक संभवित है. अन्यथा 'बालब्भसंघकज्जे ' ऐसा उल्लेख न होकर ' संघकज्जे' इतना ही उल्लेख काफी होता. इस उल्लेखसे प्रतीत होता है कि श्रीदेवर्द्धिगणि क्षमाश्रमणको माधुरी वालमी वाचनाओंको व्यवस्थापित करनेमें इनका प्रमुख साहाय्य रहा होगा. दिगम्बराचार्य देवसेनकृत दर्शनसारनामक ग्रन्थ में श्वेताम्बरो की उत्पत्तिके वर्णनप्रसंग में જ્ઞાનાંજલિ छत्तीसे वरिससर विक्कमरायस्स मरणपत्तस्स । सोरडे उत्पण्णो सेवडसंघो हु वलहीए ॥५२॥ पक्क पुण संतिणामो संपत्तो वलहिणामणयरीए । बहुसी संपत्तो विसर सोप रमे ॥५३॥ इस प्रकारका उल्लेख है. यद्यपि इस उल्लेखमें दिया हुआ संवत् मिलता नहीं है तथापि उपर्युक्त 'वाल भसंघकज्जे' गाथा में निर्दिष्ट वालभ्यसंघकार्य, शांतिसूरि, वलभि, आदि उल्लेखके साथ तुलना करने के लिये दर्शनसारका यह उल्लेख जरूर उपयुक्त है. देवर्द्धिगमि जो स्वयं माथुरसंघ के युगप्रधान थे, उनकी अध्यक्षता में वलभीनगर में एकत्रित संघसमवायमें दोनों वाचनाओंके श्रुतघर स्थविरादि विद्यमान थे. इस संघसमवाय में सर्वसम्मति माथुरी वाचनाको प्रमुख स्थान दिया गया होगा. इसका कारण यह हो सकता है कि माधुरीवाचनाके जैन आगमोंकी व्यवस्थितता एवं परिमाणाधिकता थी. इसमें ज्योतिष्करंडक जैसे प्रन्थोंको भी स्थान दिया गया जो केवल वालभी वाचनामें ही थे. इतना ही नहीं अपितु माथुरी वाचनासे भिन्न एवं अतिरिक्त जो सूत्रपाठ एवं व्याख्यान्तर थे उन सबका उल्लेख नागार्जुनाचार्य के नामसे तत्तत् स्थान पर किया भी गया. आचारांग आदिकी चूर्णिओंमें ऐसे उल्लेख पाये जाते हैं. समझमें नहीं आता कि जिस समय जैन आगमों को पुस्तकारूढ किया होगा उस समय इन वाचनान्तरों का संग्रह किस ढंग से कीया होगा ?, जैन आगम की कोई ऐसी हस्तप्रति मौजूद नहीं है जिसमें इन वाचनाभेदों का संग्रह या उल्लेख हो. आज हमारे सामने इस वाचनाभेदको जाननेका साधन प्राचीन चूर्णिग्रन्थोके अलावा अन्य एक भी ग्रन्थ नहीं है. चूर्णियाँ भी सब आगमोंकी नहीं किन्तु केवल आवश्यक, नन्दी, अनुयोगद्वार, दशवैकालिक, उत्तराध्ययन, आचारांग, सूत्रकृतांग, भगवती, जीवाभिगम, जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति, निशीथ, कल्प, पंचकल्प, व्यवहार एवं दशाश्रुतस्कन्धकी ही मिलती हैं. Jain Education International ऊपर जिन आगमोंकी चूर्णियोंके नाम दिये गये हैं उनमें से नागार्जुनीय - वाचनाभेदका उल्लेख केवल आचारांग, सूत्रकृतांग, उत्तराध्ययन व दशवैकालिककी चूर्णियों में ही मिलता है. अन्य आगमों में For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210571
Book TitleJain Agamdhar aur Prakrit Vangamaya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPunyavijay
PublisherPunyavijayji
Publication Year1969
Total Pages42
LanguageHindi
ClassificationArticle & Ascetics
File Size3 MB
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