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________________ 128 श्री अगरचन्द नाहटा ( ) छत्तागारूत्तमंगदेसे रिणव्वण समलट्ठ मट्टचदद्ध समरिणडाले उडुवइ पडिपुण्ण सोमवयणे अल्लीण पमाणजुत्तासवणे सुस्सवणे पीणमंसल कवोलदेस भाए प्राणामिय चावरूइल किण्ह ब्भराइतगुकसिणणिणेद्धभमुहे अवदालियपुडरीयण यणे कोयासिय धवलपत्त लच्छे गरूलायतउज्जु गणासे उवचिय सिलप्प वालबिबफलसण्णि भाहरो? पंडुर ससिसयल विमल रिणम्मल संख गोक्वीरफेणकुददगरयमुणालिया घवल दंत सेढ़ी अखंड दते अप्फुडियदंते अविरलदते सुरिणद्धदंते सुजायदंते एगदंतसेढ़ी विद प्रणेग दंते हुयवहरिणद्धतधोयतत्त वणिज रततलतालुजी है अद्विय सृविभत्तचित्तमंसू मंसल संठिय पसत्थसदूल विउलहणुए चउरंगुलसुप्पमारण कंबुवर सरिसग्गीवे वर महिस वराहसोह सर्ल उसम नागवर पंडिपुणविउलक्खंघे जुगसन्निभपीण रइयपीवर पउछसुसंठिय सुसिलिद्वि विसठ्ठ घण थिर सुबद्ध संधिपुर घरफलिहवट्टियभुए भुयईसरविउल भोग प्रायाण पलिए उच्छूढ दीहबाहू रत्ततलो वइयमउयमंसलसुजायलक्खणपसत्थ अच्छिद्दजालपाली पीवरकोमलवरंगुली आर्य बत बत लिण सुइ रूइ लणिद्धणक्खे चंद पाणि लेहे सूरपाणिलेहे संख पाणिलेहे चक्कपाणीलेहे दिसासोत्थिय पाणिलेहे चंदसूर संखचक्क रिसा सोत्यिय पाणिलेहे कणगसिलायलुज्जलपसत्थ समतलउवचियविच्छिण्ण पिहुल वच्छे सिरिवच्छं क्कियवच्छे अकरंडुयकणगरूययनिम्मल सुजायनिरूवयदेहधारी अट्ठ सहस्स पडिपुण्णवरपुरिसलक्खणधरे सण्णयपासे संगयपासे सुन्दरपासे सुजायपासे मियमाइय पीणरइयपासे उज्जुय समसहिय जच्चतणुकसिणरिणद्ध प्राइज्जल डहरमणिउज्जरोमराई झसविहग सुजायपीण कुच्छी झसोयरे सुइकरणे पउमवियडणाभे गंगावत्तगयाहिणावत्ततरंग भंगुर रवि किरण तरूणबोहियप्रकोसायंतपउमगंभीर वियडणा भे साह्यसोणंदमुसलदापणणिकरियवरकरण गच्छरूसरिसवर वइरवलियमझे पमुयइवरतुरगसीहवरवट्टियकडीवरतुरगसुजायसुगुज्झ देसे प्राइण्णं हउव्व णिखवलेवे वरवारणतुन्लविक्कमविलसइयगई गयससणसुजायसन्निभोरू समुग्ग णिमग्गगूढ़ जाणू एणीकुरूविंदावत्त वद्वारणुपुत्वजंघे संठिय सुसिलिट्ठ विसिट्ठगूढगुप्फे सुप्पइठ्ठियकुम्भचारूचलणे अणुपुव सुसंहयंगुलीए उण्णयतरगुतंवरिणद्धणक्खे रत्तुप्लयपत्तमउय सुकुमाल कोमलतले अठ्ठसहस्सवर पुरिसलक्खणधरे नग नगरमगर सागर चक्कंकवंरगमंगलंकियचलणे विसिठ्ठरुवे हुयवहनिद्ध जलियतडितडियतरूणर विकिरणसरिसतेए / ............" दूसरे उपांग ‘राजप्रश्नीय' में सांस्कृतिक सामग्री बहुत अच्छी है उसमें सूर्याभिदेव के 32 प्रकार के नाटक और देवलोक के वर्णन में वहां की रत्नमय पुस्तक का विवरण, तथा अन्य अनेक वर्णन व विवरण बड़े महत्व के हैं। जीवभिगम' और "प्रज्ञापना" सूत्र यद्यपि सैद्धान्तिक विषय के हैं पर उनमें भी अनेक प्रकार के पशु, पक्षी, वृक्ष, भाषा, आदि जीव और जड़ पदार्थों का विवरण महत्व का है। "जम्बूदीप प्रज्ञप्ति" में प्राचीन भूगोल और ज्योतिष की जानकारी महत्व की है और ऋषभदेव का चरित्र, भारत की छः खण्ड साधना का वर्णन बड़ा उपयोगी है। 'चन्द्रप्रज्ञप्ति 'सूर्य प्रज्ञप्ति' से प्राचीन ज्योतिष की महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है / 'निरयावली' आदि पंचोपांग में महाराजा कोणिक और चेड़ा के युद्ध का वर्णन उस समय के युद्ध का सजीव चित्र उपस्थित करता है। छ: छेद सूत्र मूनि जीवन में कैसी विषमता आई और उसका परिहार कैसे किया जा सकता है, एक तरह से मुनियों का दण्ड विधान ये शास्त्र है / उनकी भाषा चूणियों में प्रचुर सांस्कृतिक सामग्री है। नंदी और अनुयोगद्वार तो सांस्कृतिक दृष्टि से बहुत महत्व के हैं जिन पर कभी स्वतन्त्र रूप से प्रकाश डाला जायगा। कल्पसूत्र के स्वप्न आदि के विवरण भी बहुत सुन्दर हैं। 'उत्तराध्ययन' भी बहुत महत्वपूर्ण है जिम में नेमिनाथ तथा गौतम और केशी सम्वाद प्रादि अध्ययन बहुत ही महत्व के हैं। समग्र जैनागम और प्राकृत साहित्य के अवलोकन से भारतीय सस्कति को ठीक से समझने में बहुत मदद मिलती है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210564
Book TitleJain Agam Auppatik Sutra ka Sanskrutik Adhyayan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAgarchand Nahta
PublisherZ_Jinvijay_Muni_Abhinandan_Granth_012033.pdf
Publication Year1971
Total Pages8
LanguageHindi
ClassificationArticle & Agam
File Size814 KB
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