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________________ जटासिंहनन्दि का वराङ्गचरित और उसकी परम्परा ६९५ ३०/५-६ ४/२४-२५ ये तीन गाथाएं आतुरप्रत्याख्यान से सीधे वराङ्गचरित में गईं ३०/८-९ ४/२५-२६-२७ या मूलाचार के माध्यम से वराङ्गचरित में गई यह एक अलग प्रश्न है। ३०/१०-११ ४/२८-२९ मूलाचार यापनीय ग्रन्थ है। अत: यदि ये गाथाएं मूलाचार से भी ली गई ३०/१२ ४/३३ (आंशिक) हों तो भी जटासिंहनन्दि और उनके ग्रन्थ वराङ्गचरित के यापनीय होने की ३०/१३ ४/३५ (आंशिक) ही पुष्टि होती है । यद्यपि कुन्दकुन्द के ग्रन्थों में भी ये गाथाएं पायी जाती ३०/१५ ४/३७ हैं, किन्तु इतना निश्चित है कि कुन्दकुन्द ने भी ये गाथाएं मूलचार से ही यद्यपि सम्पूर्ण विवरण की दृष्टि से वराङ्गचरित का कर्म सिद्धान्त ली होंगी । और पुन: मूलाचार में आतुरप्रत्याख्यान की ली गई सभी सम्बन्धी विवरण उत्तराध्ययन की अपेक्षा विकसित प्रतीत होता है । इसी गाथायें समाहित कर ली गई हैं, अतः अन्ततोगत्वा तो ये गाथायें आतर प्रकार की समानता स्वर्ग-नरक के विवरण में देखी जाती है। उत्तराध्ययन ली में ३६ वें अध्ययन की गाथा क्रमांक २०४ से २१६ तक वराङ्गचरित के आवश्यकनियुक्ति की भी निम्न दो गाथाएं वराङ्गचरित में नवें सर्ग के श्लोक १-१२ तक किंचित् शाब्दिक परिवर्तन के साथ संस्कृत रूप में पायी जाती हैं। आश्चर्य की बात यह है कि जटासिंहनन्दि भी आगमों हयं नाणं कियाहीणं, हया अन्नाणओ किया । के अनुरूप बारह देवलोकों की चर्चा करते हैं। पासंतो पंगुलो दड्डो घावमाणो अ अंघओ ।।१।। इसी प्रकार प्रकीर्णक साहित्य की भी अनेक गाथाएँ वराङ्गचरित में अपने संस्कृत रूपांतरण के साथ पायी जाती हैं । देखें - संयोगसिद्धिइ फलं वयंति, न हु एकचक्केण रहो पयाइ । अंघो य पंगूय वणे समिच्चा, ते संपउत्ता नगरं पविट्ठा ।।२।। दंसणभट्ठो भट्ठो, न हु भट्ठो होइ चरणपब्मट्ठो । दसणमणुपत्तस्स उ परियडणं नत्थि संसारे ।।६५ ।।। तुलनीय - दसणभट्ठो भट्ठो, दंसणभट्ठस्स नत्थि निव्वाणं ।। क्रियाहीनं च यज्ज्ञानं न तु सिद्धिं प्रयच्छति । सिज्झंति चरणरहिया, दंसणरहिया न सिझंति ।।६६।। परिश्यन्यथा पंगु मुग्धो दग्धो दवाग्निना ।।९९।। - भक्तपरिज्ञा। तौ यथा संप्रयुक्तौ तु दवाग्निमधिगच्छतः । तुलनीय . तथा ज्ञानचरित्राभ्यां संसारान्मुच्यते पुमान् ।।१०१।। दर्शनाद्मष्ट एवानुभ्रष्ट इत्यभिधीयते । -वराङ्गगचरित, सर्ग २६ न हि चारित्रविभ्रष्टो भ्रष्ट इत्युच्यते बुधैः ।।१६।। आगम, प्रकीर्णक और नियुक्ति साहित्य का यह अनुसरण महता तपसा युक्तो मिथ्यावृष्टिरसंयतः । जटासिंहनन्दि और उनके ग्रंथ को दिगम्बरेतर यापनीय या कूर्चक तस्य सर्वज्ञसंदृष्ट्या संसारोऽनन्त उच्यते ।।९७।। सम्प्रदाय का सिद्ध करता है। -वराङ्गचरित, सर्ग २६ ८. जटासिंहनन्दि ने न केवल सिद्धसेन का अनुसरण किया है इसी प्रकार वराङ्गचरित के निम्न श्लोक आतुर प्रत्याख्यान में पाए अपितु उन्होंने विमलसूरि के पउमचरिय का भी अनुसरण किया है । चाहे जाते हैं। यह अनुसरण उन्होंने सीधे रूप से किया हो या रविषेण के पद्मचरित के एकस्तु में शाश्वतिकः स आत्मा सदृष्टिसज्ज्ञानगुणैरूपेतः । माध्यम से किया हो किन्तु इतना सत्य है कि उन पर यह प्रभाव आया शेषाश्च में बाहातमाश्च भावाः संयोगसल्लक्षणलक्षितास्ते ।।१०१।। है । वराङ्गचरित में श्रावक के व्रतों की जो विवेचना उपलब्ध होती है वह संयोगतो दोषमवाप जीवः परस्परं नैकविधानुबन्धि । न तो पूर्णतः श्वेताम्बर परम्परा के उपासकदशा के निकट है और न तस्माद्विसंयोगमतो दुरन्तमाजीवितांतादहमुत्सृजामि ॥१०२ पूर्णत: दिगम्बर परम्परा द्वारा मान्य तत्त्वार्थ के पूज्यपाद् देवनन्दी के सर्वेषु भूतेषु मनः समं मे वैरं न मे केनचिदस्ति किंचित् । सर्वार्थसिद्धि के मूलपाठ के निकट है । अपितु वह विमलसूरि के आशां पुनः क्लेशसहस्त्रमूलां हित्वा समाधि लघु संप्रपद्ये ।।१०३॥ पउपचरिय के निकट है । पउमचरिय के समान ही इसमें भी देशावकासिक - वराङ्गचरित, सर्ग ३१ । व्रत का अन्तर्भाव दिव्रत में मानकर उस रिक्त स्थान की पूर्ति के लिए तुलनीय सलेखना को बारहवाँ शिक्षाव्रत माना गया है। कुन्दकुन्द ने भी इस एगो मे सासओ अप्या नाण-दसणसंजुओ। परम्परा का अनुसरण किया है। किन्तु कुन्दकुन्द विमलसूरि से तो सेसा मे बहिरा भावा सव्ये संजोगलक्खणा ।।२७॥ निश्चित ही परवर्ती हैं और सम्भवतः जटासिंहनन्दि से भी । अत: उनके संजोगमूला जीवेणं पत्त दुक्खपरंपरा । द्वारा किया गया यह अनुसरण अस्वाभाविक भी नहीं है । स्मरण रहे कि तम्हा संजोगसम्बन्ध सव्वं भावेण वोसिरे ।।२८।। कुन्दकुन्द ने त्रस-स्थावर के वर्गीकरण, चतुर्विध मोक्षमार्ग आदि के सम्बन्ध सम्मं मै सव्वभूएस वे मज्झ न केणई । में भी आगमिक परम्परा का अनुसरण किया है। स्पष्ट है कि विमलसरि आसाओ वोसिरित्साणं समाहिं पडिवज्जए ।।२२।। के पउमचरिय का अनुसरण रविषेण, स्वयंभू आदि अनेक यापनीय - आतुर प्रत्याख्यान आचार्यों ने किया है। अत: जटासिंहनन्दि के यापनीय होने की संभावना Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210499
Book TitleJatasinh Nandi ka Varangcharit aur uski Parampara
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSagarmal Jain
PublisherZ_Shwetambar_Sthanakvasi_Jain_Sabha_Hirak_Jayanti_Granth_012052.pdf
Publication Year1998
Total Pages7
LanguageHindi
ClassificationArticle & 0_not_categorized
File Size788 KB
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