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________________ ६९६ जैन विद्या के आयाम खण्ड-६ प्रबल प्रतीत होती है। मात्र एक बार दिगम्बर शब्द का प्रयोग मिला है। समान्यतया 'विशीर्णवस्त्रा' ९. जटासिंहनन्दि ने वराङ्गचरित के नवें सर्ग में कल्पवासी देवों शब्द का प्रयोग हुआ है । एक स्थल पर अवश्य मुनियों को निरस्त्रभूषा' के प्रकारों का जो विवरण प्रस्तुत किया है वह दिगम्बर परम्परा से भिन्न कहा गया है किन्तु निरस्त्रभूषा का अर्थ साज-सज्जा से रहित होता है, है। वैमानिक देवों के भेद को लेकर श्वेताम्बर और दिगम्बर परम्परा में नग्न नहीं। - ये कुछ ऐसे तथ्य हैं जिन पर वराङ्गचरित की परम्परा का स्पष्ट रूप से मतभेद है । जहाँ श्वेताम्बर परम्परा वैमानिक देवों में १२ निर्धारण करते समय गम्भीरता से विचार किया जाना चाहिए । मैं चाहूंगा विभाग मानती है वहाँ दिगम्बर परम्परा उनके१६ विभाग मानती है । इस कि आगे आने वाले विद्वान् सम्पूर्ण ग्रन्थ गम्भीरतापूर्वक आलोडन करके संदर्भ में जटासिंहनन्दि स्पष्ट रूप से श्वेताम्बर या आगमिक परम्परा के इस समस्या पर विचार करें। निकट हैं । वे नवें सर्ग के द्वितीय श्लोक में स्पष्ट रूप से यह कहते साध्वियों के प्रसंग में चर्चा करते समय उन्हें जीर्ण-शीर्ण वस्त्रों हैं कि कल्पवासी देवों के बारह भेद हैं। पुन: इसी सर्ग के सातवें श्लोक को धारण करने वाली अथवा विशीर्ण वस्त्रों से आवृत्त देह वाली कहा से नवें श्लोक तक उत्तराध्ययन सूत्र के समान उन १२ देवलोकों के नाम गया है। इससे भी यह सिद्ध होता है कि वराङ्गचरितकार जटासिंहनन्दि भी गिनाते हैं। यहाँ वे स्पष्ट रूप से न केवल दिगम्बर परम्परा से भिन्न को स्त्री दीक्षा और सवस्त्र दीक्षा मान्य थी । जबकि कुन्दकुन्द स्त्री दीक्षा होते हैं बल्कि किसी सीमा तक यापनीयों से भिन्न प्रतीत होते हैं । यद्यपि का सर्वथा निषेध करते है। स्मरण रखना होगा कि यापनीयों में प्रारम्भ में आगमों का अनुसरण करते ११. वराङ्गचरित में स्त्रियों की दीक्षा का स्पष्ट उल्लेख है। हुए १२ भेद मानने की प्रवृत्ति रही होगी किन्तु बाद में दिगम्बर परम्परा उसमें कहीं भी ऐसा उल्लेख नहीं है कि स्त्री को उपचार से महाव्रत होते या अन्य किसी प्रभाव से उनमें १६ भेद मानने की परम्परा विकसित हुई हैं जैसा कि दिगम्बर परम्परा मानती है । इस ग्रन्थ में उन्हें तपोधना, होगी। तत्त्वार्थसूत्र के सर्वार्थसिद्धि मान्य-पाठ में तथा तिलोयपण्णत्ति में अमित-प्रभावी, गणाग्रणी, संयमनायिका जैसे सम्मानित पदों से अभिहित इन दोनों ही परम्पराओं के बीज देखे जाते हैं । तत्त्वार्थसूत्र का सर्वार्थसिद्धि किया गया है। साध्वी वर्ग के प्रति ऐसा आदरभाव कोई श्वेताम्बर या मान्य यापनीय पाठ जहां देवों के प्रकारों की चर्चा करता है वहां वह १२ यापनीय आचार्य ही प्रस्तुत कर सकता है । अत: इतना निश्चित है कि का निर्देश करता है किन्तु जहाँ वह उनके नामों का विवरण प्रस्तुत जटासिंहनन्दि का वराङ्गचरित कुन्दकुन्द की उस दिगम्बर परम्परा का करता है तो वहां १६ नाम प्रस्तुत करता है। यतिवृषभ की तिलोयपण्णत्ति ग्रन्थ नहीं हो सकता जो स्त्रियों की दीक्षा का निषेध करती हो या उनके में भी १२ और १६ दोनों प्रकार की मान्यताएं होने के स्पष्ट उल्लेख उपचार से ही महाव्रत कहे गये हैं, ऐसा मानती हो । कुन्दकुन्द ने पाये जाते हैं। इससे स्पष्ट लगता है कि प्रारम्भ में आगमिक मान्यता सूत्रप्राभृत गाथा क्रमांक २५ में एवं लिङ्गप्राभृत गाथा क्रमांक २० में स्त्री का अनुसरण करते हुए यापनीयों में और यदि जटासिंहनन्दि कूर्चक हैं दीक्षा का स्पष्ट निषेध किया है। तो कूर्चकों में भी कल्पवासी देवों के १२ प्रकार मानने की परम्परा रही १२. वराङ्गचरित में श्रमणों और आर्यिकाओं को वस्त्रदान की होगी। आगे यापनीयों में १६ देवलोकों की मान्यता किसी अन्य परम्परा चर्चा है । यह तथ्य दिगम्बर परम्परा के विपरीत है। उसमें लिखा है कि के प्रभाव से आयी होगी। “वह नृपति मुनि पुङ्गवों को आहारदान, श्रमणों और आर्यिकाओं को वस्त्र १०. वराङ्गचरित में वरांगकुमार की दीक्षा का विवरण देते हुए और अन्नदान तथा दरिद्रों को याचित दान (किमिच्छदानं ) देकर कृतार्थ लिखा गया है कि -'श्रमण और आर्यिकाओं के समीप जाकर तथा उनका हुआ।" यहाँ प्रश्न उपस्थित होता है कि मूल श्लोक में जहाँ मुनि विनयोपचार (वन्दन) करके वैराग्ययुक्त वरांगकुमार ने एकांत में जा पुङ्गवों के लिए आहारदान का उल्लेख किया गया है वहाँ श्रमण और सुन्दर आभूषणों का त्याग किया तथा गुण, शील, तप एवं प्रबुद्ध तत्त्व आर्यिकाओं के लिए वस्त्र और अन्न (आहार) के दान का प्रयोग हुआ है। रूपी सम्यक् श्रेष्ठ आभूषण तथा श्वेत शुभ्र वस्त्रों को ग्रहण करके वे संभवत: यहाँ अचेल मुनियों के लिए ही 'मुनिपुङ्गव' शब्द का प्रयोग जिनेन्द्र द्वारा प्रतिपादित मार्ग में अग्रसर हुए। दीक्षित होते समय मात्र हुआ है और सचेल मुनिके लिए 'श्रमण' । भगवती आराधना एवं उसकी आभूषणों का त्याग करना तथा श्वेत शुभ्र वस्त्रों को ग्रहण करना दिगम्बर अपराजित टीका से यह स्पष्ट है कि यापनीय परम्परा में अपवाद मार्ग परम्परा के विरोध में जाता है। इससे ऐसा लगता है कि जटासिंहनन्दि में मुनि के लिए वस्त्र-पात्र ग्रहण करने का निर्देश है। दिगम्बर परम्परा से भिन्न किसी अन्य परम्परा का अनुसरण करने वाले वस्त्रादि के संदर्भ में उपरोक्त सभी तथ्यों को दृष्टिगत रखते हुए थे। यापनीयों में अपवाद मार्ग में दीक्षित होते समय राजा आदि का नग्न यह कहा जा सकता है कि जटासिंहनन्दि और उनका वराङ्गचरित भी होना आवश्यक नहीं माना गया था । चूंकि वरांगकुमार राजा थे अत: सम्भव यापनीय/कूर्चक परम्परा से सम्बद्ध रहा है। है कि उन्हें सवस्त्र ही दीक्षित होते दिखाया गया हो । यापनीय ग्रन्थ भगवती १३. वर्ण-व्यवस्था के सन्दर्भ में भी वराङ्गचरित के कर्ता जटासिंहनन्दि आराधना एवं उसकी अपराजिता टीका में हमें निर्देश मिलते हैं कि राजा का दृष्टिकोण आगमिक धारा के अनुरूप अति उदार है । उन्होंने वराङ्गचरित आदि कुलीन पुरुषों के दीक्षित होते समय या संथारा ग्रहण करते समय के पच्चीसवें सर्ग में जन्मना आधार पर वर्ण व्यवस्था का स्पष्ट निषेध किया अपवाद लिंग (सवस्त्र) रख सकते हैं। पुन: वराङ्गचरित में हमें मुनि की है। वे कहते हैं कि वर्ण व्यवस्था कर्म-विशेष के आधार पर ही निश्चित होती चर्या के प्रसंग में हेमन्त काल में शीत-परिषह सहते समय मुनि के लिए है इससे अन्य रूप में नहीं। जातिमात्र से कोई विप्र नहीं होता, अपितु Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210499
Book TitleJatasinh Nandi ka Varangcharit aur uski Parampara
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSagarmal Jain
PublisherZ_Shwetambar_Sthanakvasi_Jain_Sabha_Hirak_Jayanti_Granth_012052.pdf
Publication Year1998
Total Pages7
LanguageHindi
ClassificationArticle & 0_not_categorized
File Size788 KB
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