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________________ यतीन्द्रसूरि स्मारक ग्रन्थ : जैन-धर्म भगवान् महावीर ब्रह्माग्नि से दीप्त ऋषिकल्प महामानव थे। इसलिए उनके चिन्तन में ज्ञान की बातें अधिक है। शास्त्र की बातें कम। वे स्वयं ज्ञानावतार थे। ज्ञाता और ज्ञेय से परे । ज्ञान प्रज्ज्वलित अग्नि की तरह है और शास्त्र ज्ञानाग्नि के बुझ जाने के बाद अवशिष्ट राख की तरह । ज्ञान की अग्नि सभी कोई सह नहीं पाते। शास्त्र की बात तो सभी सँभाल लेते हैं। भगवान महावीर ने शास्त्र की बातें नहीं की हैं। ज्ञान की बातें कही हैं, जिनका सम्बन्ध दुःखतप्त प्राणियों के आर्त्तिनाश से जुड़ा है। ज्ञान के अंगार से जूझना जितना असाधारण है, शास्त्र की राख को अपनाना उतना ही साधारण । शास्त्र की राख को मानव बदल सकता है, किन्तु ज्ञान की आग तो उसी को बदल देगी। रूपान्तरित कर डालेगी। ज्ञान सत्य का ही पर्याय है, इसलिए तीखा होता है, चुभने वाला । सत्य सदा अपराजित रहता है, किन्तु नियति यह है कि सत्य के पक्षधरों को आजीवन असत्य के विरोध से जूझना पड़ता है । भगवान् महावीर भी यही नियति रही। भगवान् महावीर ऐसे अप्रतिम महाप्राज्ञ थे, जिनके हाथ में ज्ञान था, शास्त्र नहीं। शास्त्र यदि कीचड़ के समान है, तो ज्ञान कीचड़ में उत्पन्न कमल की तरह। महावीर ने अपने को शास्त्र की कीचड़ से निकालकर कमल की तरह रूपान्तरित किया था। सार ग्रहण करने के बाद भूसे की तरह ग्रन्थ का त्याग कर वह निर्ग्रन्थ हो गये थे। इसके अतिरिक्त वे भावविशुद्ध होने के कारण मन से भी निर्ग्रन्थ हो गये थे और बाहर से भी निर्ग्रन्थ या अचेलप्राय हो गये थे । इस प्रकार, वे शास्त्र, मन और शरीर, तीनों ही स्तरों पर अपरिग्रही हो गये थे। इतना ही नहीं, उनकी ज्ञानाग्नि के चतुर्दिक उठने-बैठने वाले भी उनसे अपने को रूपान्तरित करने की प्रेरणा प्राप्त करते थे । किन्तु हैरानी की बात यह है कि जिस प्रकार धर्म का विरोध अधार्मिक नहीं करते वरन् तथाकथित धार्मिक करते हैं। उसी प्रकार महावीर का विरोध सच्चे ज्ञानियों से नहीं, तथाकथित ज्ञानियों, यानी शास्त्र की राख के पूजकों ने किया। किन्तु विस्मय की बात यह है कि भगवान् महावीर का विरोध ज्यों-ज्यों बढ़ता गया, उनके धार्मिक और दार्शनिक सिद्धान्त विस्तार पाते चले गये। बाईस परीषहों को सहन करने वाले भगवान् महावीर प्रकृतिविजेता हो गये थे। बारह वर्ष और साढ़े छह मास तक कठोर चर्या का पालन करते हुए वे आत्मसमाधि में लीन रहे। भगवान् साधनाकाल में समाहित हो गये थे, अपने-आप में केवली एकमेक हो गये थे। वे अनन्त चतुष्टय, अनन्तज्ञान, Jain Education International अनन्तदर्शन, अनन्त आनंद और अनन्त तीर्थ के धारक बन गये थे। उनका अन्त:करण सतत् क्रियाशील और आत्मान्वेषी हो गया था। For Private साधना की सिद्धि के बाद भगवान् महावीर सर्वलोक और सर्वभाव जानने-देखने लगे थे। उनका साधनाकाल समाप्त हो गया था। अब वे सिद्धिकाल की मर्यादा में पहुँच गये थे । तपोजीवन के तेरहवें वर्ष के सातवें दिन वे केवली बन गये थे। भगवान् ने अपना पहला प्रवचन देव-परिषद् में किया था। अति विलासी तथा व्रत-संयम के अवमूल्यनकारी देवों की सभा में उनका पहला प्रवचन निष्फल हो गया। भगवान् जृम्भक ग्राम (जंभियगाम) से विहार कर मध्यम पावापुरी पधारे। वहाँ सोमिल नामक ब्राह्मण ने एक विराट् यज्ञ का आयोजन किया था। जिसकी पूर्ति के लिए वहाँ इंद्रभूति प्रमुख ग्यारह वेदविद् ब्राह्मण आये हुए थे। धर्म के नव्य व्याख्याता भगवान् महावीर के पधारने की बात सुनकर उन ब्राह्मणों में पाण्डित्य का भाव उद्ग्रीव हुआ । इन्द्रभूति उठे और पराजित करने की भावना से अपने सभी शिष्यों के साथ वे महावीर के समवसरण में आये। इंद्रभूति को जीव के बारे में संदेह था जिसे मनःपर्याय - ज्ञानी भगवान ने उनके समक्ष रखा गया। इंद्रभूति विस्मित रह गये। वे सहम गये। उन्हें अपने सर्वथा प्रच्छन्न विचार के भगवान् द्वारा प्रकाशित किये जाने पर घोर आश्चर्य हुआ। उनकी अन्तरात्मा भगवान् के चरणों में झुक गयी। जीव और आत्मा को एक दूसरे का पर्याय मानने वाले भगवान् ने उनका संदेह - निवर्तन किया । इंद्रभूतिप्रमुख (जिनमें अग्निभूति, वायुभूति आदि वेदविदों के नाम उल्लेखनीय हैं) ग्यारहों ब्राह्मणविद् उठे, भगवान को नमस्कार किया और उनके शिष्य बन गये। भगवान् ने उन्हें छह जीवनिकाय (पृथिवी, अप, तेज, वायु, वनस्पति, त्रसकायिक) पाँच महाव्रत (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह ) तथा पच्चीस भावनाओं ( पच्चीस प्रकार के आत्मपर्यवेक्षण) का उपदेश दिया। गौतमगोत्रीय इन्द्रभूति जैनवाङ्मय में गौतम नाम से प्रतिष्ठित हुए। वहीं भगवान् के प्रथम गणधर और ज्येष्ठ शिष्य बने। भगवान् के साथ इनके संवाद और प्रश्नोत्तर इनके इसी नाम से उपलब्ध होते हैं। म ম[६२ भगवान् महावीर की तपःपूत वाणी ने श्रमणों को तो आकृष्ट किया ही अनेक ब्राह्मणों अन्यतीर्थिक संन्यासियों और परिव्राजकों को भी आवर्जित किया। वे भगवान् पार्श्वनाथ की चातुर्यामिक धर्मपरम्परा के श्रमण, भगवान् महावीर के शिष्य SEAR Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210424
Book TitleKrantdarshishalaka Purush Bhagavan Mahavir
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRanjan Suridev
PublisherZ_Vijyanandsuri_Swargarohan_Shatabdi_Granth_012023.pdf
Publication Year1999
Total Pages4
LanguageHindi
ClassificationArticle & Tirthankar
File Size638 KB
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