________________ 4/ विशिष्ट निबन्ध : 385 द्विजकुमार-राजर्षि, हमारा भ्रम दूर हुआ। आपने तो जैसे ओंधेको सीधा कर दिया हो / आज हमें मालम हुआ कि यज्ञ, यागादि क्रियाकांडोंका लक्ष्य भोग है, मुक्ति नहीं / ये भौतिक उद्देश्यसे किये जानेवाले हैं आत्म-दर्शनके लिए नहीं / 'प्लवा ह्येतेऽदृढाः' ये यज्ञादि संसारसमुद्रसे तारनेके लिए समर्थ नहीं हैं / एकमात्र सद्-दृष्टि और आत्म-दर्शन ही तारक है, साधन है और धर्म है। AMAMMA MAP Annih. NAMM.. Muys Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org