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________________ का लेख है । १६४७ में पाटण चौमासा किया श्राविका कोडां फलादेश दिया। बादशाह ने इस हिंसामय कार्य को अनुचित को व्रतोच्चारण करवाया। फिर अहमदाबाद होते हुए जानकर जैनविधि से ग्रहशांति अनुष्ठान करने का मंत्री खंभात पधारे। कर्मचन्द्र को आदेश दिया। आपके त्याग-तपोमय जीवन और विद्वत्ता की सौरभ मंत्रीश्वर ने चैत्र सुदि १५ के दिन सोने चांदी के घड़ों अकबर के दरबार तक जा पहुँची। अकबर ने मंत्री से एक लाख के सद्व्यय से वाचक महिमराजजी के द्वारा कर्मचन्द्र को आदेश देकर एवं सूरि महाराज को शीघ्र सुपार्श्वनाथजी मन्दिर में शांति-स्नात्र करवाया। मंगलदीप लाहौर पधारने के लिये फरमान भिजवाये। सूरिजी खंभात और आरती के समय सम्राट और शाहजादा सलीम ने से अहमदाबाद पधारे। आषाढ़ सुदि १३ को लाहौर के उपस्थित होकर दस हजार रुपये प्रभुभक्ति में भेंट किये। लिए प्रस्थान कर महेशाणा, सिद्धपुर, पालनपुर होते हुए प्रभु का स्नात्रजल को अपने नेत्रों में लगाया तथा अन्तःपुर सीरोही के सुरतान देवड़ा की वीनति से सीरोही पधारे। में भी भेजा । सम्राट अकबर सूरिमहाराज को "बड़े गुरु" पर्यषण के ८ दिन सीरोही में बिताये । राव सुरतान नाम से पुकारता था, इससे उनकी इसी नाम से सर्वत्र ने पूर्णिमा के दिन जीवहिंसा निषिद्ध घोषित की। वहां से प्रसिद्धि हो गई। जालोर पधारे। बादशाह का फरमान आया कि आप एकबार नौरंगखान द्वारा द्वारिका के जैन मन्दिरों चौमासे बाद शीघ्र पधारे पर शिष्यों को पहले ही लाहोर के विनाश की वार्ता सुनी तो सुरिजी ने सम्राट को तीर्थभेज दें। सू रजी ने महिमराज वाचक को ठा० ७ से लाहौर माहात्म्य बतलाते हुए उनकी रक्षा का उपदेश दिया। भेजा । सरिजी चौमासा उतरने पर देछर, सराणा, भमराणी सम्राट ने तत्काल फरमान पत्र लिखवाकर अपनी मुद्रा खांडप, द्रु णाडा, रोहीठ पधारे। इन सब नगरों में बड़े २ लगाके मंत्रीश्वर को समर्पित कर दिया, जिसमें लिखा था नगरों का संघ वंदनार्थ आया था। गुरुदेव पाली, सोजत, कि आज से समस्त जैन तीर्थ मन्त्री कर्मचन्द्र के अधीन बोलाडा, जयतारण होते हुए मेड़ता पधारे। मंत्रीश्वर हैं। गजरात के सबेदार आजमखान को तीर्थरक्षा के लिए कर्मचन्द्र के पुत्र भाग्यचन्द, लक्ष्मीचन्द्रने प्रवेशोत्सवादि किये। सख्त हुक्म भेजा, जिससे शत्रुजय तीर्थ पर म्लेच्छोपद्रव का नागौर, बापेऊ, पड़िहारा, राजलदसेर, मालासर, रिणी, सरसा, निवारण हुआ। कसर होते हुए हापाणा पधारे । मंत्रीश्वर ने सूरिजी के लाहौर एकबार काश्मीर विजय के निमित्त जाते हुए सम्राट ने प्रवेश की बड़ी तैयारियाँ की। सं० १६४८ फा० शु० १२ के सरि महाराज को बुलाकर आशीर्वाद प्राप्त किया और दिन ३१ साधुओं के परिवार सहित लाहौर जाकर बादशाह आषाढ़ शक्का से पूर्णिमा तक बारह सूबों में जीवों को को धर्मोपदेश दिया। सम्राट, गुरु महाराज के प्रवचन से बड़ा अभयदान देने के लिए १२ फरमान लिख भेजे। इसके प्रभावित हुआ और प्रतिदिन ड्योढी-महल में बुलाकर अनुकरण में अन्य सभी राजाओं ने भी अपने-अपने राज्यों में उपदेश श्रवण प्रारंभ किया। एकवार सम्राट ने गुरु महाराज के समक्ष एकसो स्वर्ण मुद्राएँ भेंट रखी जिसे अस्वीकार करने १० दिन, १५ दिन, २० दिन, महीना, दो महीना तक पर उनकी निष्पृहता से वह बड़ा प्रभावित हुआ। जीवों के अभयदान की उद्घोषणा कराई। एकबार शाहजादा सलीम के मूल नक्षत्र में पुत्री उत्पन्न सम्राट ने अपने कश्मीर प्रवास में धर्मगोष्ठी व जीवहई तो ज्योतिषी लोगों ने उस पुत्री का जन्मयोग पिता के दया प्रचार के लिए वाचक महिमराज को भेजने की प्रार्थना लिए अनिष्टकारी बतला कर नदी में प्रवाहित करने का की। मंत्रीश्वर और श्रावक वर्ग साथ में थे ही अतः सूरिजी ने Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210008
Book TitleAkbar Pratibodhak Yugapradhan Jinchandrasuri
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBhanvarlal Nahta
PublisherZ_Manidhari_Jinchandrasuri_Ashtam_Shatabdi_Smruti_Granth_012019.pdf
Publication Year1971
Total Pages8
LanguageHindi
ClassificationArticle & Ascetics
File Size768 KB
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