SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 185
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ सप्तमः परिच्छेदः । अत आ मिपि वा ॥ ३० ॥ अकारान्ताद्धातोर्मिपि परत आकारादेशो भवति वा । हसामि, समि । ( स्पष्टे ) ॥ ३० ॥ अत आ मिपि वा आकारान्तस्य धातोरुत्तमपुरुषैकवचने ( मिपि ) परतः कारादेशो वा स्यात् । जाणामि । पने-जाणेमि । सहामि, सहेमि ॥ ३० ॥ अत इति । अकारान्त धातु को उत्तमपुरुष के एकवचन में अर्थात् मिप् के परे आकारादेश विकल्प से हो । पक्ष में-'लादेशे वा' इससे एकार । ज्ञा धातु, 'ज्ञो जाणमुणौ' १९ इससे जाण आदेश । उक्त सूत्र से आकार । पक्ष में एकार | जाणामि धम्मं जाणेमि वा ॥ ३० ॥ १६६ इच्च बहुषु ॥ ३१ ॥ मिपो बहुषु परतोऽत इकारादेशो भवति चकारादाकारश्च । हसिमो, हसामो । हसिम, हसामु ( ७-४ झि = मो, मु, शे० रुप० ) ॥ ३१ ॥ इस बहुपु - बहुष्वर्येषु उत्तमपुरुषे परे धातोरत आकार इकारश्च वा स्यात् । लहामो, लहिमो । णिच्छामो, णिच्छिमो । सहामो, सहिमो । इत्यादि ॥ ३१ ॥ इच्श्चेति । उत्तमपुरुषसम्बन्धी बहुवचन के परे धातु के अकार को आकार और इकार हो । लभ् धातु से उत्तम - बहुवचन, महिप्रत्यय । 'न्तिहेत्थामोमु०' इससे मो आदेश | 'शेषाणामदन्तता' से अदन्तस्व । 'खघथधकभां ह:' इससे भकार को हकार । उक्त सूत्र से आकार | एवं पक्ष में इकार लहामो, लहिमो । एवं दृश धातु से मस्प्रत्यय । 'न्तिहेत्था०' से मो आदेश । 'दृशेः पुलअणिअच्छ०' ७/७५, से णिअच्छ आदेश । उक्त सूत्र से आकार एवं इकार । णिअच्छामो, णिअच्छिमो । वसन्तराज ने दृश धातु को णिक्क आदेश मान कर णिअक्कामो, णिभक्किमो - उदाहरण दिये हैं, वे चिन्स्थ हैं, क्योंकि 'हशे पुलअ०' सूत्र में 'णिअच्छ' ही पाठ है और स्वयं भी उसकी व्याख्या करते हुये 'जिअच्छछ' उदाहरण दिया है— इति । सह धातु, 'शेषाणामदन्तता' । सहामो, सहिमो । साधुस्व पूर्ववत् ॥ ३१ ॥ क्ते ॥ ३२ ॥ प्रत्यये परतोऽत इर्भवति । हसिअं ( २-२ तलोपः, शे० स्प०, ५-३० बिं० ) । पढिअं' (२-२४ ठ = ढ, शे० पू० ) ॥ ३२ ॥ के - 'अत इदित्यनुवर्तते । अकारान्तस्य धातोरिकारादेशो भवति तप्रत्यये परतः । भरियं । जाणि । पढिनं ॥ ३२ ॥ के इति । उक्त सूत्रों से अतः और इत् की अनुवृत्ति होती है, तो यह अर्थ होता है, कि अकारान्त धातु को इकार आदेश होता है । भरिअं । स्मृ चिन्तायाम् । क्तप्रत्यय | 'स्मरतेर्भरसुमरौ' से भर आदेश । आदिस्थ भकार है, इससे, अथवा भकारोबारण सामर्थ्य से 'खघथधफभां ह:' इससे हकार नहीं होगा, अन्यथा 'हर' आदेश पढते । १. इसामः । २. इसितं, पठितम् । २१ प्रा० प्र०
SR No.091018
Book TitlePrakruta Prakasa
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagganath Shastri
PublisherChaukhamba Vidyabhavan
Publication Year
Total Pages336
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Grammar
File Size14 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy